कृतघ्नता किसे कहते है? Ungratefulness

किसी के द्वारा अपने प्रति किये गये सत्कार्यो को भूल जाने वाले या न मानने वाले व्यक्ति को कृतघ्न कहते हैं तथा इस प्रकार की क्रिया कृतघ्नता कहलाती है। आज के हिसाब से इसके अन्य अर्थ भी समझे जा सकते है जैसे की - नमकहराम, नाशुक्रा

कृतघ्नता का अर्थ in English - Ungratefulness
कृतघ्नता का विलोम कृतज्ञता 

कृतज्ञ और कृतघ्न में क्या अंतर है?

कृतज्ञ और कृतघ्न में अंतर -
कृतज्ञ और कृतघ्न एक दूसरे के विपरीतार्थक शब्द हैं। किसी के द्वारा किए गए उपकार को सदैव याद रखने वाला प्राणी "कृतज्ञ"और किए गए उपकार को भुला देने वाला प्राणी कृतघ्न कहलाता है। अर्थात किसी द्वारा किए गये उपकार को मानना उसके प्रति उदारता रखना कृतज्ञ कहलाता है, जबकि किसी के किए गये उपकार को न मानना अर्थात उसके प्रति अनुदार होना कृतघ्न कहा जाता है।


कृतघ्न को समझने के लिए हम महाभारत की एक कहानी से समझते है - 

द्रुपद और द्रोण की मित्रता फिर समय आने पर द्रुपद का कृतघ्न बन जाना 

आचार्य द्रोण महर्षि भरद्वाज के पुत्र थे। पांचाल-नरेश का पुत्र द्रुपद भी द्रोण के साथ ही भरद्वाज-आश्रम में शिक्षा पा रहा था। दोनों में गहरी मित्रता थी। द्रुपद द्रोण के ज्ञान से बड़े प्रभावित थे। द्रोण भी अपने मित्र को वो सभी कुछ बताते जो उनके पास एक ब्राह्मण के रूप में प्राप्त था। इसलिए कभी-कभी राजकुमार द्रुपद भी उत्साह में आकर द्रोण से यहाँ तक कह देता था कि पांचाल देश का राजा बन जाने पर मैं आधा राज्य तुम्हें दे दूँगा। शिक्षा समाप्त होने पर द्रोणाचार्य ने कृपाचार्य की बहन से ब्याह कर लिया। उससे उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम उन्होंने अश्वत्थामा रखा। द्रोण अपनी पतली और पुत्र को बड़ा प्रेम करते थे।

द्रोण बड़े गरीब थे। वह चाहते थे कि धन प्राप्त किया जाए और अपनी पली व पुत्र के साथ सुख से रहा जाए। उन्हें खबर लगी कि परशुराम अपनी सारी संपत्ति गरीब ब्राह्मणों को बाँट रहे हैं, तो भागे-भागे उनके पास गए, लेकिन उनके पहुँचने तक परशुराम अपनी सारी संपत्ति वितरित 'कर चुके थे और वन-गमन कौ तैयारी कर रहे थे। द्रोण को देखकर वह बोले-“ब्राह्मण-श्रेष्! आपका स्वागत है। पर मेरे पास जो कुछ था, वह मैं बाँट चुका हूँ। अब यह मेरा शरीर और यह धनुर्विद्या ही है।

बताइए, मैं आपके लिए क्या करूँ? तब द्रोण ने उनसे सारे अस्त्रों के प्रयोग तथा रहस्य सिखाने की प्रार्थना की। परशुराम ने यह प्रार्थना स्वीकार कर ली और द्रोण को धनुर्विद्या की पूरी शिक्षा दे दी।

कुछ समय बाद राजकुमार द्रुपद के पिता का देहावसान हो गया और द्रुपद राजगद्दी पर बैठा। द्रोणाचार्य को जब द्रुपद के पांचाल देश की राजगद्दी पर बैठने कौ खबर लगी, तो यह सुनकर वह बड़े प्रसन्‍न हुए और राजा द्रुपद से मिलने पांचाल देश को चल पड़े। उन्हें गुरु के आश्रम में ध्रुपद की लड़कपन में की गई बातचीत
याद थी। सोचा, यदि आधा राज्य न भी देगा तो 'कम-से-कम कुछ धन तो ज़रूर ही देगा। यह आशा लेकर द्रोणाचार्य राजा द्रुपद के पास पहुँचे और बोले-“मित्र द्रुपद, मुझे पहचानते हो न?

मैं तुम्हारा बालपन का मित्र द्रोण हूँ। आपको याद है बचपन में आप कृतज्ञ होकर कहते थे की में आपको आधा राज्य दे दूंगा।  लेकिन मित्र मुझे आधा राज्य नहीं चाहिए, कृपा करके मुझे पांच गाय दे दो क्युकी मेरा परिवार इतना गरीब है की मेरे पुत्र को अभी तक चावल का पानी और दूध में अंतर नहीं पता। पुत्र के दूध के लिए आज में अपने मित्र के सामने याचक बनकर खड़ा हु। 

ऐश्वर्य के मद में मत्त हुए राजा द्रुपद को द्रोणाचार्य का आना बुरा लगा और द्रोण का अपने साथ मित्र का-सा व्यवहार करना तो और भी अखरा। वह द्रोण पर गुस्सा हो गया और 'बोला - ब्राह्मण,तुम्हारा यह व्यव्हार ठीक नहीं है।  मुझे मित्र कहकर पुकारने का तुम्हें साहस कैसे हुआ? सिंहासन पर बैठे हुए एक राजा के साथ एक दरिद्र प्रजाजन की मित्रता कभी हुई है? तुमको गाय चाहिए तो एक ब्राह्मण की तरह मांग लो। मुझे आपका कृतज्ञ कहकर मेरा अपमान कर रहे हो।  भला एक राजा किसी गरीब का मित्र कैसे हो सकता है। 

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तुम्हारी बुद्धि कितनी कच्ची है! लड़कपन में लाचारी के कारण हम दोनों को जो साथ रहना पड़ा, उसके आधार पर तुम द्रुपद से मित्रता का दावा करने लगे! दरिद्र की धनी के साथ, मूर्ख की विद्वान के साथ और कायर कौ वीर के साथ मित्रता कहीं हो सकती है? मित्रता बराबरी को हैसियतवालों में ही होती है। जो किसी राज्य का
स्वामी न हो, वह राजा का मित्र कभी नहीं हो सकता।” 

ध्रुपद की इन कठोर वचनो को सुनकर द्रोणाचार्य बड़े लज्जित हुए और उन्हें क्रोध भी बहुत आया। उन्होंने बस इतना ही कहा - कि हे राजन ! बात वही कहो जो पूरी कर सको।  उन्होंने निश्चय किया कि मैं इस कृतघ्न राजा को सबक सिखाऊँगा और बचपन में जो मित्रता की बात हुई थी, उसे पूरा करके चैन लूँगा। वह हस्तिनापुर पहुँचे और वहाँ अपनी पत्नी के भाई कृपाचार्य के यहाँ गुप्त रूप से रहने लगे। यहां आकर भीष्म के कहने पर उन्होंने पांडव और कौरवों को अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान दिया। गुरुदक्षिणा के रूप में द्रोणाचार्य ने पांडव और कौरवों के सामने राजा द्रुपद को बंदी बनाकर लाने को कहा। कौरव इस काम में असफल हुए, लेकिन पांडव अपने पराक्रम से राजा द्रुपद को बंदी बना लाए। इस तरह द्रोणाचार्य ने अपने अपमान का बदला लिया।

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