आसक्ती, विरक्ति और अनासक्ति का अर्थ क्या है?

जीवन में नैतिक मूल्यों या नैतिक शिक्षा Values education को समझने के लिए आपको कर्तव्यों का पालन करना अति आवशयक है जिसे श्रीमदभगवद गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को समझाया था। यहाँ हम समझते है की आसक्ती, विरक्ति और अनासक्ति का अर्थ क्या है और जीवन में क्या महत्त्व है। 

Asakti Kya hai? -

आसक्ती का अर्थ -

श्री भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्रीमदभगवद गीता में अर्जुन को समझाते हुए कहा है की आसक्ति के कारण हम विषयों के अधीन हो जाते हैं। यहाँ आसक्ति के कई कारण हो सकते है और विषय का अर्थ कामना या इच्छा होती है। कर्मयोग फल की आसक्ति के त्याग को कहता है। जिससे मनुष्य भयमुक्त हो जाता है और मनुष्य सुखी हो जाता है। आसक्ति का त्याग सिर्फ कर्मयोग के द्वारा ही संभव है। 
आसक्ति का अर्थ है किसी वस्तु के प्रति विशेष रुचि, मोह या आकर्षण होना।

मनुष्य की चिन्ता या क्लेश का मूल कारण आसक्ति ही  है।

कैसे उत्पत्न  होती है आसक्ति? -


जब मनुष्य में ये चार दोष होते है तब उसमे आसक्ति की उत्पन्न हो जाती है। जैसे की 
  • मोह, लगाव या स्नेह
  • चाह या इच्छा
  • प्रेम (लेकिन निस्वार्थ प्रेम के त्याग की आवश्यकता नहीं है)
  • फल की इच्छा या कर्मो का परिणाम की चिंता 

ऋषि-मुनियों या संत-संन्यासियों की सांसारिक पदार्थों में आसक्ति नहीं होती। ज्ञानीजन संसार में बिना किसी फल की चिंता किये बिना कर्म करते है।  क्युकी उन्हें पता है कर्म का फल उनके हिसाब या उनकी इच्छानुसार मिल भी सकता और नहीं भी। 
जब कर्म के फल की इच्छा, मोह या आसक्ति रखते है तो अंत में भारी दुःख सहना पड़ता है। और चिंता से जैसे भयंकर रोग लग जाते है। चिंता मनुष्य के लिए लकड़ी में लगी दीमक के समान है जो उसे धीरे धीरे खोखला करती है। 

उदाहरण के लिए राम और भरत सम्राट के बेटे हैं, किन्तु महल-अटारी से उन्हें कोई आसक्ति नहीं। दोनों ही महलो के सुख त्याग कर भी सुखी रहते है। क्युकी सुख की परिभाषा मनुष्य का अपना मन तय करता है। जिस पर काबू करने पर मनुष्य हमेशा के लिए सुखी हो जाता है। जो मूर्ख मनुष्य तीव्र आसक्ति रखता है, वह जीते जी पृथ्वी पर नरक जैसा जीवन जीता है। 

Anasakti Kya hai? -

अनासक्ति का अर्थ -

वास्तव में आसक्ति का त्याग ही अनासक्ति कहलाता है। और दिन प्रतिदिन अपने कर्मो में सुधार करते हुए अर्थात कर्तव्य का पालन करते हुए धर्म का पालन करे। 
अनासक्त का अर्थ है, कोई पूर्वाग्रह नहीं होना । परिस्थिति के अनुसार जो उचित है, वह कर दें और आगे बढ़ जाएं ।मनुष्य की प्रसन्नता या सुख का मूल कारण अनासक्ति ही है।

अनासक्ति एक ऐसा शब्द है जिसे आज तक बहुत कम समझा गया है । लोग अक्सर अनासक्ति को वैराग्य समझ लेते हैं । वैराग्य का सही अर्थ है- राग से विरक्ति या भोग विलास का त्याग लेकिन अनासक्ति का अर्थ है न आकर्षण न विकर्षण।

अक्सर हम देखते हैं कि हमें जो लोग पसंद होते है, उनके प्रति हमें आकर्षण होता है उनसे बिछड़ने की कल्पना मात्र से हम डर जाते हैं और जो पसंद नहीं होते, उनकी शक्ल भी देखना हमे गंवारा नहीं होता । उनसे हमें विकर्षण होता है। यह पूरी सृष्टि ईश्वर की बनाई है, यहा कुछ गलत नहीं है । सृष्टि की हर वस्तु ईश्वर ने हमें अपने विवेकानुसार उपयोग तथा उपभोग के लिए दी है । इन वस्तुओं का परित्याग कर यदि हम अपनी जिम्मेदारियों से पलायन करेंगे तो हम ईश्वर के विधान का उल्लंघन करेंगे । ईश्वर का विधान यह है कि तुम कर्म करने में स्वतंत्र हो लेकिन फल पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है। अर्थात फल तुम्हारी इच्छानुसार नहीं मिलेगा बल्कि तुम्हारे कर्म अनुसार ही मिलेगा । तो तुम जैसे भी कर्म करो लेकिन कर्म के बाद तुम उसके फल से बच नहीं सकते । इसी कर्म के सिद्धान्त को श्रीक़ृष्ण ने अनासक्ति के रूप में व्यक्त किया है ।

Virakti Kya hai? -

विरक्ति का अर्थ -

विरक्ति का अर्थ है संसार में रहकर भी संसार की जगह सीधा भगवान् से सम्बन्ध से जोड़ना। अर्थात अनासक्ति के साथ साथ ह्रदय में भगवान और सभी जीवो के प्रति निस्वार्थ प्रेम का होना। 
जब मनुष्य अनासक्ति के कारण सुखी हो जाता था तभी वो भगवान् की भक्ति कर सकता है।  दुखी मनुष्य कभी भक्ति नहीं कर सकता। 

कैसे उत्पत्न  होती है विरक्ति ? -

अनासक्ति का पालन करते करते मनुष्य के अंदर विरक्ति पैदा होती है। अर्थात संसार में अनासक्ति और विधाता से सीधा सम्बन्ध विरक्ति या वैराग्य कहलाती है। इसलिए साधुजन संसार के भौतिक सुखो को त्यागकर वैराग्य को धारण करके हमेशा प्रसन्न रहते है, सुखी रहते है। 

यहाँ तक की गृहस्थ आश्रम या घर परिवार में रहते हुए भी मनुष्य मोह, इच्छा, कामना से दूर रह सकता है। इससे मनुष्य अपने घर को ही स्वर्ग बना लेता है। क्युकी कर्म करते समय अगर विरक्ति होती है तो कर्म के फल से उसे सुख दुःख नहीं होता है। और इसी वैराग्य के द्वारा वह मनुष्य सीधा ईश्वर से जुड़कर अपने धर्म का पालन करता है, लेकिन इसके लिए कर्तव्य का ज्ञान होना अति आवश्यक है। जिसे सिर्फ दिव्य-ज्ञान के द्वारा ही समझा जा सकता है। पर चिंता न करे क्युकी दिव्य- ज्ञान की प्राप्ति श्रीमद भागवत महापुराण या श्रीमद भगवद गीता के निस्वार्थ भाव अर्थात बिना किसी फल की प्राप्ति के लिए इन्हे पढ़ने के बाद आसानी से समझ में आने लगता है। 

आसक्ती, विरक्ति और अनासक्ति का अर्थ क्या है? asakti anasakti virakti Kya hai



अध्याय : 3 :श्लोक : 20
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ ३-२०॥

कर्मणा एव हि संसिद्धिम् आस्थिताः जनक-आदयः ।
लोक-सङ्ग्रहम् एव अपि सम्पश्यन् कर्तुम् अर्हसि ॥ ३-२०॥

राजा जनक जैसे अन्य मनुष्यों ने भी केवल कर्तव्य-कर्म करके ही परम-सिद्धि को प्राप्त की है, अत: संसार के हित का विचार करते हुए भी तेरे लिये कर्म करना ही उचित है। (२०)

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