राष्ट्रवाद एक विचार या भाव है जो राष्ट्र (एक देश) को महत्व देती है। राष्ट्र का अर्थ होता है कि उस भूभाग पर रहने वाले सभी व्यक्तियों की स्वाधीनता, सुरक्षा, संप्रभुता, और उत्कृष्टता को प्राथमिकता देना होता है।
राष्ट्रवाद के अनुसार, राष्ट्र के लोगों के बीच अच्छे संबंध, आपसी समझ, सुरक्षा, आत्मरक्षा, सहायता, अधिकारों की समानता और साझा मूल्यों का प्रसार होना चाहिए। राष्ट्रवाद का मूल मंत्र "एकता और स्वाभिमान" है, जिसका अर्थ होता है कि एक राष्ट्र में लोगों को एकजुट होना चाहिए और उन्हें अपने राष्ट्र के प्रति गर्व महसूस करना चाहिए।
राष्ट्रवाद के प्रमुख लक्ष्य में शामिल होते हैं -
- राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता
- अर्थव्यवस्था का विकास
- सामाजिक और सांस्कृतिक समृद्धि
- सभी नागरिकों के अधिकारों की समानता
राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता -
यह किसी राष्ट्र की योजनाओं और क्रियाओं का प्रत्येक नागरिक और सरकार द्वारा किया गया ऐसे कर्म होते है जो स्वयं के साथ साथ उस राष्ट्र के हित में भी होते है। और कभी कभी राष्ट्र को अपनी जरूरतों को स्वयं पूर्ण करने की क्षमता प्रदान करने का प्रयास करती है। यह राष्ट्र अपने उद्योगों, कृषि, और अन्य क्षेत्रों में स्वावलम्बी बनने के लिए नीतियों और योजनाओं का अनुसरण करता है, और वह राष्ट्र अपनी नौसेना, वायुसेना, और सेना में स्वदेशी उत्पादों का उपयोग करता है और विभिन्न क्षेत्रों में निवेश करके अपनी रक्षा और सुरक्षा क्षमता को बढ़ाता है।
उदाहरण -
वह राष्ट्र बुरे समय (जैसे कोरोनाकाल, युद्धकाल ) में भी अपने देश के नागरिको की रक्षा, माता की तरह कर सकता है। इसलिए आत्मनिर्भर भारत को प्रत्येक नागरिक भारत माता के नाम से प्रेम से सम्बोधित करता है।
अर्थव्यवस्था का विकास -
जब किसी राष्ट्र की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने के लिए की गयी कार्रवाईयों और नीतियों का वह समूह जो केवल देश और उसके नागरिको के भविष्य के हितों को ध्यान में रखते हुए बनाये गए है, और भविष्य जिसका सकारात्मक प्रभाव उस राष्ट्र की अर्थव्यवस्था पर पड़ता भी है, अर्थात अर्थव्यवस्था का विकास होता है।
उदाहरण -
वह राष्ट्र जो अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में निवेश करता है और अपने क्षेत्रीय उत्पाद अर्थात लोकल प्रोडक्ट को बनाने के लिए नई नीतियों को अपनाता है। और वह राष्ट्र जो अपने निर्यात और आवासीय निवेश के माध्यम से अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए विभिन्न उद्योगों को बढ़ावा देता है। जैसे कि Local for Vocal, Make in India, GST जैसे अन्य सुधार
सामाजिक और सांस्कृतिक समृद्धि -
ऐसा राष्ट्र की सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा देने के लिए क्रियाएं ऐसे कार्य करता है या नीतियाँ बनाता है जिसमे शिक्षा, स्वास्थ्य, कला, साहित्य, और अन्य क्षेत्रों में विकास के लिए योजनाएं शामिल होती हैं। वह अपने सामाजिक न्याय, समानता, और देश की अपनी सांस्कृतिक समृद्धि को बनाये रखने के प्रति प्रतिबद्ध होता है। यह राष्ट्र जो शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, कला, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करके अपने नागरिकों के सामाजिक और सांस्कृतिक विकास को प्रोत्साहित करता है।
उदाहरण -
जैसे - श्रीराम मंदिर, महाकाल मंदिर, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर आदि के विकास से वहां आध्यात्मिक और भौतिक रूप से विकास करना।
अधिकारों की समानता:
यह राष्ट्र के सभी नागरिकों को समान अधिकार और विचारात्मक मूल्यों के साथ सम्बोधित करने की प्रक्रिया है। अर्थात राष्ट्र जो नागरिकों को विभिन्न विधियों के माध्यम से समान अधिकार और न्याय प्रदान करने के लिए संविधान और कानूनों का पालन करता है। यह राष्ट्र जो सभी नागरिकों को समानता, न्याय, और अधिकारों की सुरक्षा के लिए संविधान में उल्लेखित अधिकारों का पूरा करने के लिए सकारात्मक कदम उठाता है
उदाहरण -
जैसे कि चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में समानता के लिए नीतियां बनाना और लागू करना। पुराने कानूनों को समय के अनुसार बदलाव करना।
राष्ट्रवादिता का जन्म -
राष्ट्र की संस्कृति की इकाई कुल की अर्थात परिवार की संस्कृति होती है, इसलिए देखा जाता रहा है कि जो परिवार अपनी संस्कृति को महत्त्व नहीं देते है उनकी संतति राष्ट्र को भी उतना महत्त्व नहीं दे पाती है अंततः वह संतति आगे चलकर नकारात्मक विचार को ही अपनी विचारधारा का नाम देते है, मानो वह नकारात्मक विचारधारा उनकी संस्कृति से बड़ी हो। उनकी नकारात्मक विचारधारा का जन्म राष्ट्र से ज्यादा स्वार्थ को मानने के कारण होती है। उस स्वार्थ की उत्पत्ति का कारण अल्पज्ञान और लालच होता है।
भगवान् की स्वयं की वाणी श्रीमदभगवद गीता में भी प्रमुख रूप से राष्ट्र धर्म की ही शिक्षा दी गई है । अर्थात भगवान ने स्वयं बताया है कि व्यक्ति का राष्ट्र के प्रति क्या धर्म होना चाहिए? कौन से गुण होने चाहिए जिससे वह राष्ट्र का निर्माण, निर्वाह और सुरक्षा कर सके ।
राष्ट्रधर्म के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति में राष्ट्रवादिता , पराक्रमशीलता, पारदर्शिता , दूरदर्शिता , मानवता , अध्यात्म , निस्वार्थ प्रेम, आत्मरक्षा और विनयशीलता जैसे गुण हों । श्रीगीता में इन्हीं तत्वों को विकसित करने का ज्ञान दिया गया है । इसलिए व्यक्ति के हृदय में भी धर्म और तत्वज्ञान की मांग तभी होगी जब उसमें राष्ट्र के प्रति प्रेम होगा और अपने वह उसके प्रति कर्तव्य का अनुभव करेगा । इस प्रकार श्रीमदभगवद गीता के प्रथम अध्याय से ही राष्ट्र के प्रति समपर्ण दर्शाया गया है । इसलिए श्रीमद भगवद गीता, अन्य भावों के साथ साथ राष्ट्रवाद के भाव की भी जननी है।
इसी प्रकार से आपको अन्य नैतिक शिक्षा के प्रश्न की लिस्ट - Naitik Shiksha Ke Prashn List यहाँ से मिल जाएगी।
नोट: लेखक के अंदर राष्ट्रवाद के भाव की उत्पत्ति श्रीमद भगवद गीता के द्वारा ही हुयी है। यह स्वयं का व्यक्तिगत विचार है। क्युकी अपने देश से ज्यादा किसी अन्य देश के विदेशी लेखकों को अपनी संस्कृति से ज्यादा महत्त्व देना शुध्द राष्ट्रवाद नहीं कहा जा सकता है।

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