अहंकार एक ऐसी मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने आप को दूसरों से श्रेष्ठ मानता है और अपनी उपलब्धियों और गुणों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है। ऐसा व्यक्ति दूसरों की आलोचना या विरोध को सहन नहीं कर सकता। अहंकारी व्यक्ति अक्सर दूसरों की भावनाओं और जरूरतों को नजरअंदाज करता है और अपने स्वयं के हितों और इच्छाओं को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करता है।
अहंकार सबसे बड़ा नकारात्मक गुण है, जिसमे व्यक्ति ऐसे अपना सिर हिलाता रहता है, अर्थात नहीं नहीं करता रहता है जैसे बुढ़ापे में लोगो को सिर हिलाने की बिमारी लग जाती है, जिसमे डमरू की तरह सिर हिलता रहता है। गांव में लोग इसे डमरुआ बीमारी कहते है।
अहंकार की जड़ क्या है?
अहंकार का बीज ऐसे पैदा होता है, जो दिन रात बढ़ता रहता है, और व्यक्ति वास्तविकता से बहुत दूर हो जाता है।
काम (इच्छाओ) से क्रोध, क्रोध से लोभ, लोभ से मोह, मोह से मद, मद से मदस्तर और फिर इसके आगे अहंकार आता है। जिसमे व्यक्ति आँखे होते हुए देखता नहीं, कान होते हुए भी किसी की सुनता नहीं, बुध्दि होने पर सोचता नहीं।
अहंकार किसे कहते है?
बुढ़ापे में बिमारी की तरह हर किसी की बात पर नहीं नहीं करता रहता है, यह अहंकार है।

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