राजा विक्रमादित्य की कहानी - पढ़ो कम, समझो ज्यादा

राजा विक्रमादित्य की कहानी - Read less, understand more - पढ़ो कम, समझो ज्यादा (चार मूर्खो की कथा) - वैताल ने राजा विक्रमादित्य से पुनः कहा - राजन्‌! रमणीय जयपुर में वर्धमान नाम का एक राजा था। उसके गाँव में वेद वेदांग-पारंगत विष्णुस्वामी नाम का एक ब्राह्मण निवास करता था। वह राधा-कृष्ण का भक्त था। उसके चार पुत्र थे, जो विभिन्न व्यसनों में लगे रहते थे। वे जैसा निन्दित कर्म करते थे, वैसा ही उनका नाम भी निन्दित ही हो गया।

पहला पुत्र ध्युतकर्मा था, दूसरा व्यभिचारी, तीसरा विषयी और चौथा नास्तिक था। 

संयोग से दुर्भाग्यवश वे सभी निर्धन हो गये। एक बार वे सभी अपने पिता विष्णुशर्मा के पास गये। उन लोगों ने विनय-पूर्वक उन्हें नमस्कार किया और कहा - 'पिताजी! हम लोगों की लक्ष्मी कैसे नष्ट हो गयी?

पिता ने कहा - 'ध्युतकर्मण ! द्यूत ध्युतकर्म धन को नष्ट कर देता है। यह पाप का मूल है। ध्युतकर्म से व्यभिचार, चौर्य और निर्दयता आदि उत्पन्न होते हैं। यह महान्‌ दुष्परिणामकारी है। द्यूतकर्म करने के कारण तुम्हारे द्रव्य का नाश हुआ।' 

यह सुनकर उसने कहा - पितृचरण ! आप मुझे कृपया धन-प्राप्ति का सही मार्ग बतायें।

पिता ने कहा - 'तीर्थ और ब्रत के प्रभाव से तुम्हारे पाप नष्ट हो जायँगे। तुम अपने माता -पिता की बातों पर ध्यान दो, उनका कहना मानो।

तदनंतर पिता ने द्वितीय पुत्र से कहा - पुत्र! तुम व्यभिचारी हो। वेश्या का संग बड़ा अशुभ है। तुम इस अशुभ कर्म को त्यागकर ब्रह्मचर्य पूर्वक ब्रह्म परायण हो। ब्रह्मचर्य व्रत धारण करो।

तृतीय पुत्र विषयी से कहा - मांस और मदिरा सदा पाप की वृद्धि के कारण हैं, इनके द्वारा तुम चौर्य-कर्म (अर्थात चोरी, पैसे के लिए छल कपट) करोगे और नरकगामी होगे, इसलिये तुम ऐश्वर्यसम्पन्न जगत्पति, सर्वोत्तम भगवान‌ विष्णु के निमित्त द्रव्यों को समर्पित कर मौन होकर भोजन करो। 

और फिर अपने नास्तिक पुत्र से कहा - तुम देव निन्दा आदि नास्तिक भाव को छोड़कर शुद्ध आस्तिक मार्ग का अवलम्बन करो, आत्मा शुद्ध- बुद्ध एवं नित्य है और महादेवी चण्डिका महाशक्ति हैं। सभी प्राणियों के हृदय और गुहा में स्थित देवतागण परमात्मा के अंग हैं। उनका ज्ञान प्राप्तकर पाप की शान्ति के लिये उनकी पूजा करो।

यह सुनकर वे चारों पुत्र अपने पिता के द्वारा निर्दिष्ट साधनों में प्रवृत्त हो गये और सुन्दर ज्ञान की प्राप्ति के लिये सर्वेश्वर शिव की आराधना भी करने लगे। भगवान्‌ शंकर ने वर्ष भर में उन्हें संजीवनी विद्या प्रदान कर दी। वे संजीवनी विद्या प्राप्त कर एक वन में आये और वहाँ बिखरी व्याघ्र की अस्थियों पर विद्या की परीक्षा करने लगे। 

प्रथम पुत्र ने मरे हुए व्याघ्र की अस्थियों को एकत्र करके उस पर मन्त्रपूत जल छिड़का। उस मन्त्र के प्रभाव से वे अस्थियाँ पंजर रूप हो गयीं। 

दूसरे व्यभिचारी पुत्र ने उस पर मन्त्रपूत जल छिड़का, जिसके प्रभाव से वह पंजर मांस और रुधिर से सम्पन्न हो गया। 

विषयी पुत्र ने उसके ऊपर अभिमन्त्रित जल छिड़का। फलस्वरूप त्वचा और प्राण उसमें आ गये। सोये हुए व्याघ्र को जीवित करने के लिये नास्तिक पुत्र ने जल छिड़का।

मन्त्र के प्रभाव से जीवित होने पर उस व्याघ्र ने उन सभी का भक्षण कर लिया।


अब बैताल ने राजा विक्रमादित्य से पूछा - राजन्‌! अब आप बतायें कि उन चारों में सबसे बड़ा मूर्ख कौन था?

सम्राट विक्रमादित्य बोले - जिसने मेरे हुए व्याघ्र को जिलाया, वही सबसे बड़ा मूर्ख है।

इस उत्तर से वैताल अत्यन्त प्रसन्न हो गया।

वैताल ने पुनः राजा से कहा - राजा विक्रमादित्य ! भगवान‌ शंकर की आज्ञा से ही मैं तुम्हारे पास आया था। अनेक प्रकार के प्रश्नोत्तर के द्वारा मैंने तुम्हारी परीक्षा ली और तुमने सबका बुद्धिमत्तापूर्ण उत्तर दिया। इससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारी भुजाओं में मेरा निवास रहेगा, जिससे तुम पृथ्वी के समस्त शत्रुओं को जीत लोगे। दस्युओं (डाकुओं) के द्वारा सभी पुरियाँ, विविध क्षेत्र, नगर आदि नष्ट कर दिये गये हैं। इसलिये शास्त्र में बताये गये परिमाण के आधार पर पुन: उनकी रचना करवाओ और न्यायपूर्वक पृथ्वी का शासन करो। तुम्हारे राज्य में पुनः धर्म की स्थापना होगी।

इतना कहकर वह वैताल, देवी की आराधना का निर्देश देकर वहीं अन्तर्हित हो गया। राजा विक्रमादित्य ने मुनियों की आज्ञा से अश्वमेध-यज्ञ किया और वह चक्रवर्ती राजा हुआ। धर्म पूर्वक राज्य करते हुए अन्त में राजा विक्रमादित्य ने स्वर्गलोक प्राप्त किया।

राजा विक्रमादित्य के स्वर्गगमन को जानकर शौनकादि महर्षियों ने लोमहर्षण सूतजी महाराज से पुनः इतिहास एवं पुराण की पुण्यमयी कथाओं का श्रवण किया और फिर आनन्दित होते हुए वे सभी अपने-अपने स्थानों की ओर चले गये।
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पौराणिक कथाएं - स्रोत - श्री भविष्यपुराण संक्षिप्त, पेज नंबर 318, श्री गीताप्रेस गोरखपुर 

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