एक और एक ग्यारह | पंचतंत्र की नैतिक कहानी Unity and Teamwork

एक बार की बात है… बनगिरी के घने जंगल में एक मदमस्त हाथी रहता था। ताक़त के नशे में चूर, वह किसी को कुछ नहीं समझता था। पेड़ तोड़ता, शाखाएँ मरोड़ता और सबको डराता फिरता।

उसी जंगल में एक पेड़ पर चिड़िया और चिड़ा का छोटा-सा घर था। चिड़िया अंडों पर बैठी अपने बच्चों के सपने देख रही थी। तभी वह हाथी गरजता हुआ आया और पेड़ को तोड़ डाला। घोंसला गिर गया, अंडे टूट गए… चिड़िया का संसार उजड़ गया।

बेचारी चिड़िया रो रही थी। तभी उसकी दोस्त कठफोड़वा आई। उसने कहा –  
“रोने से कुछ नहीं होगा। हमें उस हाथी को सबक सिखाना होगा। याद रखो, एक और एक मिलकर ग्यारह बनते हैं!”

फिर दोनों भंवरे के पास गईं। भंवरे ने कहा –  
“मेरे पास एक मेंढक मित्र है, चलो उससे मदद लेते हैं।”

मेंढक ने सबकी बात सुनी और थोड़ी देर सोचकर बोला –  
“मेरे पास एक योजना है… इसमें सबका योगदान होगा!”

योजना शुरू हुई।  
पहले भंवरा हाथी के कानों के पास मधुर गुनगुनाने लगा। हाथी मस्ती में झूमने लगा और आँखें बंद कर लीं।  
तभी कठफोड़वा ने अपनी नुकीली चोंच से हाथी की आँखें बींध दीं। हाथी अंधा हो गया और इधर-उधर भागने लगा।  

अब हाथी को प्यास लगी। मेंढक और उसके साथी एक बड़े गड्ढे के पास ज़ोर-ज़ोर से टर्राने लगे। प्यासा हाथी आवाज़ सुनकर उसी दिशा में दौड़ा… और धड़ाम! गड्ढे में गिर पड़ा। वहीं उसका अंत हो गया।

चिड़िया ने राहत की साँस ली और बोली –  
“धन्यवाद मित्रों! तुम सबने मिलकर मेरा संसार बचा लिया।”  
मेंढक मुस्कुराया –  “जातिवाद के चक्कर में बटना नहीं चाहिए, एक रहो और संगठित रहो। ”


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