The story of the rabbit and the lion. - किसी घने जंगल में एक भयानक शेर रहता था। वह रोज़ शिकार पर निकलता और कई जानवरों को मार डालता। धीरे‑धीरे जंगल के सभी जीव डरने लगे कि अगर ऐसा चलता रहा तो एक दिन जंगल खाली हो जाएगा।
सारे जानवर इकट्ठा हुए और उपाय सोचने लगे। अंत में उन्होंने तय किया कि शेर से बात करनी चाहिए।
शेर (गरजते हुए): "क्या बात है? तुम सब यहाँ क्यों आए हो?"
जानवरों का नेता: "महाराज, आप राजा हैं और हम आपकी प्रजा। आप रोज़ बहुत जानवर मारते हैं, जिन्हें आप खा भी नहीं पाते। अगर ऐसा ही चलता रहा तो जंगल में कोई नहीं बचेगा। प्रजा के बिना राजा कैसे रहेगा? हमारी विनती है कि आप अपने घर पर रहें, और हम रोज़ आपके भोजन के लिए एक जानवर भेज देंगे।"
शेर: "ठीक है, मैं मान लेता हूँ। लेकिन याद रखना, अगर किसी दिन भोजन न मिला तो मैं जितने चाहूँगा उतने जानवर मार डालूँगा।"
उस दिन से रोज़ एक जानवर शेर के पास भेजा जाने लगा। कुछ दिनों बाद बारी आई खरगोश की। छोटा सा खरगोश था, लेकिन बहुत चतुर। उसने सोचा – "बेकार मरना मूर्खता है, कोई तरकीब निकालनी होगी।"
शेर (गुस्से में): "इतनी देर क्यों? और तुम इतने छोटे हो! किसने तुम्हें भेजा है?"
खरगोश (आदर से झुककर): "महाराज, असल में हमें छह खरगोश भेजा गया था। लेकिन रास्ते में एक और शेर मिला जिसने पाँच को खा लिया।"
शेर (दहाड़ते हुए): "क्या कहा? दूसरा शेर? कहाँ है वो?"
खरगोश: "महाराज, वह बहुत बड़ा शेर है। उसने कहा कि असली राजा वही है। उसने मुझे आपको बुलाने भेजा है।"
यह सुनकर शेर आगबबूला हो गया और खरगोश से रास्ता दिखाने को कहा। खरगोश उसे कुएँ के पास ले गया।
खरगोश: "महाराज, वह शेर यहीं रहता है। लगता है आपको देखकर अंदर चला गया। जरा कुएँ में झाँकिए।"
शेर (कुएँ में झाँकते हुए): "आह! यही है वो!"
शेर ने अपनी ही परछाईं देखी और समझा कि दूसरा शेर है। गुस्से में दहाड़ा और कुएँ में कूद पड़ा। दीवार से टकराया, पानी में गिरा और डूबकर मर गया।
इस तरह नन्हे खरगोश की चतुराई से जंगल शेर के आतंक से मुक्त हो गया। सभी जानवर खुशी से झूम उठे और खरगोश की जय‑जयकार करने लगे।
सीख - विधर्मियों अर्थात आताताइयों से बचने के लिए बुद्धि की जगह विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए।

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