बंदर का कलेजा - पंचतंत्र की कहानी

एक हरी-भरी नदी किनारे एक विशाल पेड़ खड़ा था। उस पर मीठे-रसदार फल लटकते रहते। उसी पेड़ पर एक बंदर रहता था — बड़ा मस्तमौला। दिन भर डालियों पर झूलता, कूदता-फांदता और फल खाकर आनंद लेता।

लेकिन उसके जीवन में एक कमी थी — उसका कोई अपना नहीं था। न मां-बाप की याद, न भाई-बहन, और न ही आसपास कोई दूसरा बंदर जिससे वह दोस्ती कर सके।

एक दिन वह नदी का नज़ारा देख रहा था कि अचानक पानी से एक बड़ा जीव उसकी ओर आता दिखा। बंदर ने हैरानी से पूछा — “अरे भाई, तुम कौन हो?”

जीव ने उत्तर दिया — “मैं मगरमच्छ हूं। नदी में इस साल मछलियाँ कम हो गई हैं, इसलिए खाने की तलाश में यहाँ आ गया।”

बंदर का दिल बड़ा अच्छा था। उसने सोचा — इतने फल हैं, क्यों न इस बेचारे को भी खिलाए। उसने एक फल तोड़कर मगर की ओर फेंका। मगर ने चट कर लिया और और फल की उम्मीद में देखने लगा। बंदर मुस्कराया और कई फल फेंक दिए। मगर ने पेट भरकर डकार ली और धन्यवाद कहकर चला गया।

बंदर का कलेजा - पंचतंत्र की कहानी

धीरे-धीरे दोनों में दोस्ती हो गई। रोज़ मगर आता, बंदर फल खिलाता और दोनों बातें करते। बंदर का अकेलापन मिट गया।

एक दिन बंदर को पता चला कि मगर की पत्नी भी है। उसने उलाहना दिया — “मगर भाई, भाभीजी के लिए भी फल ले जाया करो।”

मगर ने फल घर ले जाकर पत्नी को दिए। मगरनी को फल बहुत पसंद आए, लेकिन उसे यह अच्छा नहीं लगा कि उसका पति दिनभर बंदर के साथ रहता है। धीरे-धीरे उसके मन में लालच और ईर्ष्या पैदा हुई। उसने सोचा — “जो बंदर इतने मीठे फल खाता है, उसका कलेजा कितना स्वादिष्ट होगा!”

उसने बीमारी का बहाना बनाया और मगर से कहा — “वैद्यजी ने कहा है कि मेरी बीमारी सिर्फ बंदर का कलेजा खाने से ठीक होगी।”

मगर दुविधा में पड़ गया। दोस्ती और परिवार के बीच फँस गया। आखिर पत्नी के दबाव में उसने बंदर को बुलाया और कहा — “भाभीजी नाराज़ हैं कि देवरजी कभी मिलने नहीं आए। आज तुम्हें साथ चलना होगा।”

बंदर ने कहा — “मगर मैं तैरना नहीं जानता।” मगर बोला — “चिंता मत करो, मेरी पीठ पर बैठ जाओ।”

बंदर बैठ गया। लेकिन नदी के बीच पहुँचते ही मगर ने गोता लगाना शुरू किया। बंदर घबरा गया — “ये क्या कर रहे हो? मैं डूब जाऊँगा!”

मगर ने सच्चाई बता दी कि उसकी पत्नी को बंदर का कलेजा चाहिए। बंदर चौंक गया, लेकिन तुरंत बुद्धि लगाई। उसने कहा — “अरे, तुमने पहले क्यों नहीं बताया? मेरा कलेजा तो पेड़ पर ही रखा है। जल्दी वापस चलो, वरना भाभीजी मर जाएँगी।”

मगरमच्छ उसकी बात मानकर वापस लौट आया। जैसे ही पेड़ के पास पहुँचे, बंदर फुर्ती से डाल पर चढ़ गया और हँसते हुए बोला — “मूर्ख! कोई अपना कलेजा बाहर रखता है क्या? जा, अपनी दुष्ट पत्नी के पास और अपने कर्मों पर रो।”

मगरमच्छ पछताता रह गया और बंदर सुरक्षित पेड़ पर झूलता रहा।

सीख

  • धोखा देने वाला अंत में खुद धोखा खा जाता है।

  • बुद्धिमानी और चतुराई संकट से बचा सकती है।





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