Blog - आज के ब्लॉग में हम जानेंगे कि कैसे आपका एक वोट आपके लोकतंत्र में बग या वायरस ला सकता है। कैसे हम और आप उसी डाल को काट डालते है, जिस पर हम बैठे होते है, सिर्फ इसलिए क्युकी हमारे-आपके विचार नहीं मिलते है, और ये विचारो की लड़ाई डाल को काट कर अपनी सुख सुविधा ख़त्म करके ख़त्म होती है।
Why can a situation resembling a "bug" or a "virus" arise in a democracy?
संस्थागत कमजोरी -
विदेशी ताक़तों से चलने वाली पार्टियां जो कि एक दूसरे के फायदे लिए ही चलती है, ये जनता के फायदे केवल वोट को प्राप्त करने के लिए करती है जिसे ये विचारधारा की लड़ाई कहते है। जबकि किसी भी विचारधारा से जनता का कभी कोई भला नहीं होता है। विचारधारा हर कदम पर बदल सकती है। अगर यही पार्टियां अपने फायदे के लिए सविंधान में बदलाव कर दे तो वे लोकतंत्र का उपयोग आटोमेटिक मशीन की तरह कर सकते है, जिसमे बुध्दि हो सकती है, लेकिन विवेक नहीं। और अगर उसी बुध्दि का प्रयोग देश की संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग जैसी संस्थाएँ करने लगे तो वही लोकतंत्र जनता के लिए अभिशाप भी बन सकता है।
इसलिए जब भी संविधान में बदलाव हो वह विचारो के आधार पर नहीं, बल्कि मूलभूत सुविधाओं और सुरक्षा के आधार पर ही होना चाहिए, और समय समय पर आवश्यकतानुसार बदलाव भी होना चाहिए ।
बहुमत का दमन -
बहुमत से लोकतंत्र का जन्म होता है, इसलिए विदेशी शक्तियां अगर किसी देश की सरकार उनके पालतू पार्टियों के खिलाफ है तो वे उसी बहुमत के खिलाफ षणयंत्र रचकर जनता में भ्रम फैलाकर जनता की राय बदलते है, जिसमे पहले रेडियो का इस्तेमाल होता था, आज सोशल मीडिया का इस्तेमाल होता है। फिर अगर कोई ऐसी व्यवस्था ऐसा कर दे कि बहुमत कभी सत्ता में न आए, तो यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि छद्म लोकतंत्र (pseudo-democracy) बन जाता है।
इसके लिए विदेशी लोगों को एक जगह पर बसाया जाता है, ताकि छद्म बहुमत बनाया जा सके। फिर बचे हुए लोगो को विचारो की लड़ाई में भाग लेने के लिए बोला जाता है। इस प्रकार से छद्म बहुतमत तैयार करके लोकतंत्र के अंदर Bug या वायरस का प्रवेश करवाया जाता है।
और अगर बहुमत विदेशी देशो की पालतू पार्टियों के सहयोग से हासिल किया है तो वे उस देश की खनिज सम्पदा का दोहन करते है। इसका अंदाज़ा किसी देश के आयात और निर्यात के आँकड़ों से पता लगाया जा सकता है।
न्याय का संकट -
जब कानून और न्याय नागरिको के मूलभूत अधिकारों की रक्षा न करके विचारों की रक्षा करने लगे तब लोकतंत्र "वायरस" से संक्रमित हो सकता है। क्योंकि विचार सबके अलग-अलग हो सकते हैं, जिनके रक्षा करना कदापि उचित नहीं कहा जा सकता।
असली लोकतंत्र की सुरक्षा -
संविधान और संस्थाएँ लोकतंत्र की रीढ़ हैं। इन्हें स्वतंत्र और मज़बूत रखना ज़रूरी है। और यह तभी संभव है जब जनता का चुनाव अपनी विचारो की लड़ाई से ज्यादा मुलभुत सुविधाएं, सुरक्षा और सुख सुविधा हो। यही नागरिकों की जागरूकता लोकतंत्र का एंटीवायरस है।
तो अगर कोई अपनी या समाज कि सुख सुविधाओं के लिए नहीं बल्कि विचारों की रक्षा के लिए सवाल पूछती है, विरोध करती है और विकल्प तलाशती है, तो वो कही सुनसान स्थान में बस जाये, जहाँ सुख सुविधाएं बेशक नहीं होगी लेकिन विचारो की रक्षा अवश्य होगी।
इसलिए अगली बार वोट देने से पहले सिर्फ अपना, और देश की सुख सुविधाओं और सुरक्षा के बारे में सोचकर ही वोट दे, वोट देते समय धर्म, विचार, जाति को प्रधानता देना मतलब आप कठपुतली हो सकते है।

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