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पिता की वसीहत और नसीहत

एक दौलतमंद इंसान ने अपने बेटे को वसीयत देते हुए कहा, बेटा मेरे मरने के बाद मेरे पैरों में ये फटे हुऐ मोज़े (जुराबें) पहना देना, मेरी यह इक्छा जरूर पूरी करना । पिता के मरते ही नहलाने के बाद, बेटे ने पंडितजी से पिता की आखरी इक्छा बताई ।
पंडितजी ने कहा: हमारे धर्म में कुछ भी पहनाने की इज़ाज़त नही है। पर बेटे की ज़िद थी कि पिता की आखरी इक्छ पूरी हो । बहस इतनी बढ़ गई की शहर के पंडितों को जमा किया गया, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला ।

इसी माहौल में एक व्यक्ति आया, और आकर बेटे के हाथ में पिता का लिखा हुआ खत दिया, जिस में पिता की नसीहत लिखी थी
मेरे प्यारे बेटे
देख रहे हो..? दौलत, बंगला, गाड़ी और बड़ी-बड़ी फैक्ट्री और फॉर्म हाउस के बाद भी, मैं एक फटा हुआ मोजा तक नहीं ले जा सकता ।
एक रोज़ तुम्हें भी मृत्यु आएगी, आगाह हो जाओ, तुम्हें भी एक सफ़ेद कपडे में ही जाना पड़ेगा ।
लिहाज़ा कोशिश करना,पैसों के लिए किसी को दुःख मत देना, ग़लत तरीक़े से पैसा ना कमाना, धन को धर्म के कार्य में ही लगाना ।
सबको यह जानने का हक है कि शरीर छूटने के बाद सिर्फ कर्म ही साथ जाएंगे"।
लेकिन फिर भी आदमी तब तक धन के पीछे भा…
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ये हिन्दू धर्म की महत्त्वपूर्ण जानकारी अपने बच्चो को जरूर बताये.

ये हिन्दू धर्म की महत्त्वपूर्ण जानकारी अपने बच्चो को जरूर बताये. 
वेद :
वेद प्राचीन भारत के पवितत्रतम साहित्य हैं जो हिन्दुओं के प्राचीनतम और आधारभूत धर्मग्रन्थ भी हैं। भारतीय संस्कृति में वेद सनातन वर्णाश्रम धर्म के, मूल और सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं, जो ईश्वर की वाणी है।
1] ऋग्वेद
2] सामवेद
3] अथर्ववेद
4] यजुर्वेद
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शास्त्र :
व्यापक अर्थों में किसी विशिष्ट विषय या पदार्थसमूह से सम्बन्धित वह समस्त ज्ञान जो ठीक क्रम से संग्रह करके रखा गया हो, शास्त्र कहलाता है।
1] वेदांग
2] सांख्य
3] निरूक्त
4] व्याकरण
5] योग
6] छंद
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नदियां :
भारत की नदियों का देश के आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास में प्राचीनकाल से ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सिन्धु तथा गंगा नदियों की घाटियों में ही विश्व की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यताओं - सिन्धु घाटी तथा आर्य सभ्यता का आर्विभाव हुआ।
1] गंगा
2] यमुना
3] गोदावरी
4] सरस्वती
5] नर्मदा
6] सिंधु
7] कावेरी
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पुराण :
पुराण, हिंदुओं के धर्मसंबंधी आख्यानग्रंथ हैं जिनमें सृष्टि, लय, प्राचीन ऋषियों, मुनियों और राजाओं के वृत्तात आदि हैं। ये वैदिक काल के बहुत्का बाद के ग्रन्थ हैं, जो स्मृति विभाग में आते हैं। भारतीय जीवन-धारा में जिन ग्रन्थों का महत्वपूर्ण स्थान है उनमें पुराण भक्ति-ग्रंथों के रूप में बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
1] मत्स्य पुराण
2] मार्कण्डेय पुराण
3] भविष्य पुराण
4] भगवत पुराण
5] ब्रह्मांड पुराण
6] ब्रह्मवैवर्त पुराण
7] ब्रह्म पुराण
8] वामन पुराण
9] वराह पुराण
10] विष्णु पुराण
11] वायु पुराण
12] अग्नि पुराण
13] नारद पुराण
14] पद्म पुराण
15] लिंग पुराण
16] गरुड़ पुराण
17] कूर्म पुराण
18] स्कंद पुराण
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पंचामृत:
शास्त्रानुसार पांच प्रकार के अमृत माने जाने वाले पदार्थों से मिलकर बने द्रव्य को पंचामृत कहा जाता है। इसका पान करने से भी सेहत को काफी लाभ मिलता है। आइये जानते हैं इसमें कौन से पांच अमृत शामिल होते हैं।
1] दूध
2] दहीं
3] घी
4] मध
5] साकर
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पंचतत्व :
ईश्वर यानी भगवान ने अपने अंश में से पांच तत्व-भूमि, गगन, वायु, अग्नि और जल का समावेश कर मानव देह की रचना की और उसे सम्पूर्ण योग्यताएं और शक्तियां देकर इस संसार में जीवन बिताने के लिये भेजा है। हमारे शरीर को सही तरीके से चलाने के लिए पंचतत्व (पांचों तत्व) अपनी बहुत ही खास भूमिका अदा करते हैं। ये पांचों तत्व आपस में एक दूसरे की मदद लेकर शरीर को संचालित करते हैं। 
1] पृथ्वी
2] जल
3] तेज
4] वायु
5] आकाश
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तीन गुण :
सत (सत्व), रज, तम ये तीन गुण प्रकृति में रहते हैं। इन तीनों गुणों की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है। यहां गुण का अर्थ धर्म नहीं है। प्रकृति का विश्लेषण करने पर हम इसमें तीन प्रकार का द्रव्य प्राप्त करते हैं। इन्हीं का नाम त्रिगुण है। सत गुण को शुक्ल (उजला), रज गुण को रक्त (लाल) व तमोगुण को कृष्ण (काला) कल्पित किया गया है।
1] सत्व्
2] रज्
3] तम्
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तीन दोष :
वात, पित्त, कफ - ये तीन शारीरिक दोष माने गये हैं।  वात, पित्त, कफ - ये तीन शारीरिक दोष माने गये हैं।  यह हमारे शरीर के तीनो भागों में बटें होते हैं , शरीर के ऊपर के भाग में कफ होता है. शरीर के मध्य भाग में पित्त होता है और शरीर के निचले भाग में वात होता है. 
1] वात्
2] पित्त्
3] कफ
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लोक :
ब्रह्माण्ड में तीन लोक है। लोक मनुष्य समाज का वह वर्ग है जो आभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता और पांडित्य की चेतना अथवा अहंकार से शून्य है और जो एक परंपरा के प्रवाह में जीवित रहता है।
1] आकाश लोक
2] मृत्यु लोक
3] पाताल लोक
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महासागर :
हिन्दू धर्म के अनुसार निम्न महासागर है जो पृथ्वी पर ही नहीं अपितु सारे ब्रह्माण्ड में विध्यमान है. 
1] क्षीरसागर
2] दधिसागर
3] घृतसागर
4] मथानसागर
5] मधुसागर
6] मदिरासागर
7] लवणसागर
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सात द्वीप:
ये सातों द्वीप चारों ओर से क्रमशः खारे पानी, इक्षुरस, मदिरा, घृत, दधि, दुग्ध और मीठे जल के सात समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं। जम्बुद्वीप इन सब के मध्य में स्थित है।
1] जम्बू द्वीप
2] पलक्ष द्वीप
3] कुश द्वीप
4] पुष्कर द्वीप
5] शंकर द्वीप
6] कांच द्वीप
7] शालमाली द्वीप
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तीन देव :
प्राचीनकाल में 3 महत्वपूर्ण देव थे जिन्हें 'त्रिदेव' कहा गया। ये 3 देव ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। हिन्दू धर्म के इस सत्य या दर्शन को सभी धर्मों ने सहर्ष स्वीकार किया। 
1] ब्रह्मा
2] विष्णु
3] महेश
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तीन जीव :
हिन्दू पुराणों के अनुसार जीव तीन तरह के होते है या जहाँ ये विध्यमान होते है. 
1] जलचर
2] नभचर
3] थलचर
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चार वर्ण :
ये प्राचीन काल में कर्म के आधार पर था पर आज इनका कोई महत्त्व नहीं रह गया है. जैसे क्षत्रिय की जिम्मेदारी राज्य और लोगो की रक्षा करना, ब्राह्मण समाज और क्षत्रिय को सही दिशा और ज्ञान प्रदान करता था, वैश्य जीवन यापन के लिए समाज में व्यापर करता था. और शूद्र को समाज के अन्य छोटे छोटे कर्म दिए गए थे. जिसमे उन्हें ज्ञान और युद्ध की आवश्यकता नहीं होती थी. 
1] ब्राह्मण
2] क्षत्रिय
3] वैश्य
4] शूद्र
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चार फल (पुरुषार्थ) :
हिन्दू धर्म में पुरुषार्थ से तात्पर्य मानव के लक्ष्य या उद्देश्य से है। पुरुषार्थ = पुरुष+अर्थ = अर्थात मानव को 'क्या' प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। प्रायः मनुष्य के लिये वेदों में चार पुरुषार्थों का नाम लिया गया है - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। 
उक्त चार को दो भागों में विभक्त किया है- पहला धर्म और अर्थ। दूसरा काम और मोक्ष। काम का अर्थ है- सांसारिक सुख और मोक्ष का अर्थ है सांसारिक सुख-दुख और बंधनों से मुक्ति। इन दो पुरुषार्थ काम और मोक्ष के साधन है- अर्थ और धर्म। अर्थ से काम और धर्म से मोक्ष साधा जाता है।
1] धर्म
2] अर्थ
3] काम
4] मोक्ष
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चार शत्रु :
संसार में मनुष्य के चार शत्रु हैं। जिन्हें हम क्रोध, मान, माया, लोभ के नाम से जानते हैं।
1] काम
2] क्रोध 
3] मोह
4] लोभ
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चार आश्रम :
प्राचीन काल में सामाजिक व्यवस्था के दो स्तंभ थे - वर्ण और आश्रम। मनुष्य की प्रकृति-गुण, कर्म और स्वभाव-के आधार पर मानवमात्र का वर्गीकरण चार वर्णो में हुआ था। व्यक्तिगत संस्कार के लिए उसके जीवन का विभाजन चार आश्रमों में किया गया था।
1] ब्रह्मचर्य
2] गृहस्थ
3] वानप्रस्थ
4] संन्यास
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अष्टधातु :
अष्टधातु, (शाब्दिक अर्थ = आठ धातुएँ) एक मिश्रातु है जो हिन्दू और जैन प्रतिमाओं के निर्माण में प्रयुक्त होती है। जिन आठ धातुओं से मिलकर यह बनती है, वे ये हैं- सोना, चाँदी, तांबा, सीसा, जस्ता, टिन, लोहा, तथा पारा (रस) की गणना की जाती है।
1] सोना
2] चांदी
3] तांबु
4] लोह
5] सीसु
6] कांस्य
7] पित्तल
8] रांगु
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पंचदेव :
पंचदेव वे पाँच प्रधान देवता हैं, जिनकी उपासना और पूजा आदि हिन्दू धर्म में प्रचलित है और जिन्हें अनिवार्य माना गया है। इन देवताओं में यद्यपि तीन देवता वैदिक हैं, लेकिन फिर भी सभी का ध्यान और पूजा पौराणिक और तांत्रिक पद्घति के अनुसार ही की जाती है।
1] ब्रह्मा
2] विष्णु
3] महेश
4] गणेश
5] सूर्य
***********************
चौदह रत्न :
पौराणिक कथा के अनुसार देवताओं एवं दैत्यों ने मिलकर समुद्र का मंथन किया था जिसमें चौदह रत्न निकले थे। ये रत्न हैं -. लक्ष्मी, मणि, रम्भा, वारूणी, अमृत, शंख, गजराज (ऐरावत), कल्पवृक्ष, चन्द्रमा, कामधेनु, धनुष, धन्वतरि, विष, बाज पक्षी।
1] अमृत
2] अैरावत हाथी
3] कल्पवृक्ष
4] कौस्तुभ मणी
5] उच्चै:श्रवा अश्व
6] पांचजन्य शंख
7] चंद्रमा
8] धनुष
9] कामधेनु गाय
10] धनवंतरी
11] रंभा अप्सरा
12] लक्ष्मी माताजी 
13] वारुणी
14] वृष
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नवधा भक्ति
प्राचीन शास्त्रों में भक्ति के 9 प्रकार बताए गए हैं जिसे नवधा भक्ति कहते हैं। 
1. श्रवण: ईश्वर की लीला, कथा, महत्व, शक्ति, स्रोत इत्यादि को परम श्रद्धा सहित अतृप्त मन से निरंतर सुनना।
2. कीर्तन: ईश्वर के गुण, चरित्र, नाम, पराक्रम आदि का आनंद एवं उत्साह के साथ कीर्तन करना।
3. स्मरण: निरंतर अनन्य भाव से परमेश्वर का स्मरण करना, उनके महात्म्य और शक्ति का स्मरण कर उस पर मुग्ध होना।
4. पाद सेवन: ईश्वर के चरणों का आश्रय लेना और उन्हीं को अपना सर्वस्य समझना।
5. अर्चन: मन, वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्री से ईश्वर के चरणों का पूजन करना।
6. वंदन: भगवान की मूर्ति को अथवा भगवान के अंश रूप में व्याप्त भक्तजन, आचार्य, ब्राह्मण, गुरूजन, माता-पिता आदि को परम आदर सत्कार के साथ पवित्र भाव से नमस्कार करना या उनकी सेवा करना।
7. दास्य: ईश्वर को स्वामी और अपने को दास समझकर परम श्रद्धा के साथ सेवा करना।
8. सख्य: ईश्वर को ही अपना परम मित्र समझकर अपना सर्वस्व उसे समर्पण कर देना तथा सच्चे भाव से अपने पाप पुण्य का निवेदन करना।
9. आत्मनिवेदन: अपने आपको भगवान के चरणों में सदा के लिए समर्पण कर देना और कुछ भी अपनी स्वतंत्र सत्ता न रखना। यह भक्ति की सबसे उत्तम अवस्था मानी गई हैं
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ये हिन्दू धर्म की महत्त्वपूर्ण जानकारी अपने बच्चो को जरूर बताये.


कुछ अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां जो आपको जरूर होना चाहिए 
ग्यारह रुद्र : महान, महात्मा, गतिमान, भीषण, भयंकर, ऋतुध्‍वज, ऊर्ध्वकेश, पिंगलाक्ष, रुचि, शुचि तथा कालाग्नि रुद्र।- यह भी अतिति के पुत्र है। इसमें कालाग्नि रुद्र ही मुख्‍य है।
बारह आदित्य : ब्रह्मा के पुत्र मरिचि, मरिचि के कश्यप, और कश्यप की पत्नी अदिति, अदिति के आदित्य (सूर्य) कहलाए जो इस प्रकार है- अंशुमान, अर्यमन, इंद्र, त्वष्टा, धातु, पर्जन्य, पूषन, भग, मित्र, वरुण, वैवस्वत और विष्‍णु। यह बारह ही बारह मास के प्रतिक है।
सूर्य की बारह कला : तपिनी, तापिनी, ध्रूमा, मारिचि, ज्वालिनी, रुचि, सुक्षमन, भोगदा, विश्वा, बोधि‍नी, धारिणी और क्षमा।
सोलह संस्कार : गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुंडन, कर्णवेध, उपनयन, विद्यारंभ, केशांत, समावर्तन, विवाह, विवाहाग्नि, अंत्येष्टि संस्कार। 
सोलह कला : श्री, भू, कीर्ति, इला, लीला, कांति, विद्या, विमला, उत्कर्शिनी, ज्ञान, क्रिया, योग, प्रहवि, सत्य, इसना और अनुग्रह।
अठ्ठारह पुराण : गरुढ़, भागवत, हरिवंश, भविष्य, लिंग, पद्य, वामन, कूर्म, ब्रह्म वैवर्त, मत्स्य, स्कंद, ब्रह्म, नारद, कल्कि, अग्नि, शिव, विष्णु, वराह।
तैसीस देवता : 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और इंद्र व प्रजापति नाम से तैंतीस संख्या देवताओं की मानी गई है। प्रत्येक देवता की विभिन्न कोटियों की दृष्‍टि से तैतीस कोटि (करोड़) संख्‍या लोक व्यवहार में प्रचलित हो गई। जो लोग 33 करोड़ या 36 करोड़ देवी-देवताओं के होने की बात करते हैं वे किस आधार पर करते हैं यह नहीं मालूम।
रुद्रदेव के पुत्र 49 मरुद्गण : मरुत अर्थात पहाड़। मरुद्गण का अर्थ मरुतों के गण। गण याने देवता। चारों वेदों में मिलाकर मरुद्देवता के मंत्र 498 हैं। यह भी उलेखित मरुतों का गण सात-सात का होता है। इस कारण उनको 'सप्ती' भी कहते हैं।
ब्रह्मा के पुत्र : विष्वकर्मा, अधर्म, अलक्ष्मी, आठवसु, चार कुमार, 14 मनु, 11 रुद्र, पुलस्य, पुलह, अत्रि, क्रतु, अरणि, अंगिरा, रुचि, भृगु, दक्ष, कर्दम, पंचशिखा, वोढु, नारद, मरिचि, अपान्तरतमा, वशिष्‍ट, प्रचेता, हंस, यति। कुल 59 पुत्र। इति।
चौदह भुवन : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, पाताल तथा रसातल, भूर्लोक, भूवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक।
चौदह रत्न : अमृत, ऐरावत, कल्पवृक्ष, कौस्तुभ मणि, उच्चैश्रवा घोड़ा, शंख, चंद्रमा, धनुष, कामधेनु, धनवंतरि वैध, रम्भा अप्सरा, लक्ष्मी, वासुकी, वृक्ष। 
चौदह मनु : ब्रह्मा के पुत्र स्वायंभुव, अत्रि के पुत्र स्वारोचिष, राजा प्रियव्रत के पुत्र तापस और उत्तम, रैवत, चाक्षुष, सूर्य के पुत्र श्राद्धेदंव (वैवस्वत), सावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि, चंद्रसावर्णि। मनुओं के नाम पर मनवंतर के नाम रखे गए हैं।
चौदह इंद्र : स्वर्ग पर राज करने वाले चौदह इंद्र माने गए हैं। इंद्र एक पद का नाम है किसी व्यक्ति या देवता का नहीं। इंद्र एक काल का नाम भी है- जैसे 14 मनवंतर में 14 इंद्र होते हैं। 14 इंद्र के नाम पर ही मनवंतरों के अंतर्गत होने वाले इंद्र के नाम भी रखे गए हैं।
सोलह श्रृंगार : उबटन लगाना, स्नान करना, स्वच्छ वस्त्र धारण करना, मांग भरना, महावर लगाना, बाल संवारना, तिलक लगाना, ठोढी़ पर तिल बनाना, आभूषण धारण करना, मेंहदी रचाना, दांतों में मिस्सी, आंखों में काजल लगाना, इत्र आदि लगाना, माला पहनना, नीला कमल धारण करना।
चंद्र की सोलह कला : अमृत, मनदा, पुष्प, पुष्टि, तुष्टि, ध्रुति, शाशनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्सना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्ण और पूर्णामृत।

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सबसे पहले रामायण महाकाव्य किसने लिखी, किसने सुनी और किसने सुनाई??

ये प्रश्न जितना कठिन है उतना ही इसका सरल उत्तर है. यहाँ में आपको विस्तार नहीं बल्कि जो प्रश्न है उसका सटीक और कम से कम शब्दो में उत्तर देना चाहूंगा. आपको लगता होगा की रामायण एक ही है ???
जबकि मेरे हिसाब से बहुत सारी रामायण है जिनको भिन्न भिन्न महापुरुषों द्वारा अनुवाद या लिखा गया है. जैसे एक रामायण महर्षि वाल्मीकि ने लिखी है, दूसरी रामायण स्वामी तुलसीदास ने लिखी है, संस्कृत में भी कालिदास ने रघुवंश की रचना की, उसी प्रकार जैन, बोद्ध, सिख और नेपाली में रामायण के अलग अलग रचनाये मिलती है

रामायण सबसे पहले किसने लिखी ? ये बात भारत के 99% लोग जानते है की रामायण महर्षि वाल्मीकि ने सबसे पहले लिखी. आइये जानते है की कौन है महर्षि वाल्मीकि??

महर्षि वाल्मीकि को प्राचीन वैदिक काल के महान ऋषियों कि श्रेणी में प्रमुख स्थान प्राप्त है। वह संस्कृत भाषा के आदि कवि और हिन्दुओं के आदि काव्य 'रामायण' के रचयिता के रूप में प्रसिद्ध हैं। महर्षि कश्यप और अदिति के नवम पुत्र वरुण (आदित्य) से इनका जन्म हुआ। इनकी माता चर्षणी और भाई भृगु थे। वरुण का एक नाम प्रचेत भी है, इसलिए इन्हें प्राचेतस् नाम से उल्लेखि…

आप किसी भी देश के हिन्दू है तो जरूर पढ़े और बच्चों को भी बताए

क्या आप जानते है कि हिन्दू धर्म मे 33 करोड़ नहीं 33 कोटी देवी देवता हैँ; देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते हैं । एक कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता । हिंदू धर्म का दुष्प्रचार करने के लिए ये बात उड़ाई गयी की हिन्दूओं  के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो मुर्ख हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं
कोटि = प्रकार । करोड़ नहीं 
कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिंदू  धर्म में :- 12 प्रकार हैँ :-
आदित्य , धाता, मित, आर्यमा, शक्रा, वरुण, अँशभाग, विवास्वान, पूष, सविता, तवास्था, और विष्णु...! 8 प्रकार हैं :-
वासु:, धरध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष। 11 प्रकार हैं :-
रुद्र: ,हरबहुरुप, त्रयँबक, अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी, रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।
                       एवँ
दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार । कुल :- 12+8+11+2=33 कोटी
हिन्दू सत्य सनातन धर्म की कुछ और बातें जो शायद आपको पता नहीं होगी, क्युकी सनातन धर्म इतना विशाल है की शायद किसी ने अपने सारे वेद, पुराण, और अन्य धार्मिक ग्रन्थ को सारा पढ़ा हो. जो सारा पढ़ लेगा उसे सं…

बन्दर की सीख - Hindi Story On Taking Risks

बंदरों का सरदार अपने बच्चे के साथ किसी बड़े से पेड़ की डाली पर बैठा हुआ था .
बच्चा बोला , ” मुझे भूख लगी है , क्या आप मुझे खाने के लिए कुछ पत्तियां दे सकते हैं ?”

बन्दर मुस्कुराया , ” मैं दे तो सकता हूँ , पर अच्छा होगा तुम खुद ही अपने लिए पत्तियां तोड़ लो.“
” लेकिन मुझे अच्छी पत्तियों की पहचान नहीं है .”, बच्चा उदास होते हुए बोला .
“तुम्हारे पास एक विकल्प है , ” बन्दर बोला , ” इस पेड़ को देखो , तुम चाहो तो नीचे की डालियों से पुरानी – कड़ी पत्तियां चुन सकते हो या ऊपर की पतली डालियों पर उगी ताज़ी -नरम पत्तियां तोड़ कर खा सकते हो .”
बच्चा बोला , ” ये ठीक नहीं है , भला ये अच्छी – अच्छी पत्तियां नीचे क्यों नहीं उग सकतीं , ताकि सभी लोग आसानी से उन्हें खा सकें .?”

“यही तो बात है , अगर वे सबके पहुँच में होतीं तो उनकी उपलब्धता कहाँ हो पाती … उनके बढ़ने से पहले ही उन्हें तोड़ कर खा लिया जाता !”, ” बन्दर ने समझाया .

” लेकिन इन पतली डालियों पर चढ़ना खतरनाक हो सकता है , डाल टूट सकती है , मेरा पाँव फिसल सकता है , मैं नीचे गिर कर चोटिल हो सकता हूँ …”, बच्चे ने अपनी चिंता जताई .

बन्दर बोला , “सुनो बेटा , एक बात हमेशा …

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नास्तिक या आस्तिक पर ईश्वर सत्य है - सोशल मीडिया स्पेशल

नास्तिक या आस्तिक पर ईश्वर सत्य है - सोशल मीडिया स्पेशल 

1970 के समय तिरुवनंतपुरम में समुद्र के पास एक बुजुर्ग भगवद्गीता पढ़ रहे थे तभी एक नास्तिक और होनहार नौजवान उनके पास आकर बैठा!
उसने उन पर कटाक्ष किया कि लोग भी कितने मूर्ख है विज्ञान के युग मे गीता जैसी ओल्ड फैशन्ड बुक पढ़ रहे है!
उसने उन सज्जन से कहा कि आप यदि यही समय विज्ञान को दे देते तो अब तक देश ना जाने कहाँ पहुँच चुका होता!
उन सज्जन ने उस नौजवान से परिचय पूछा तो उसने बताया कि वो कोलकाता से है!
और विज्ञान की पढ़ाई की है अब यहाँ भाभा परमाणु अनुसंधान में अपना कैरियर बनाने आया है!
आगे उसने कहा कि आप भी थोड़ा ध्यान वैज्ञानिक कार्यो में लगाये भगवद्गीता पढ़ते रहने से आप कुछ हासिल नही कर सकोगे!
सज्जन मुस्कुराते हुए जाने के लिये उठे, उनका उठना था की 4 सुरक्षाकर्मी वहाँ उनके आसपास आ गए!
आगे ड्राइवर ने कार लगा दी जिस पर लाल बत्ती लगी थी!
लड़का घबराया और उसने उनसे पूछा आप कौन है???
उन सज्जन ने अपना नाम बताया 'विक्रम साराभाई'!

जिस भाभा परमाणु अनुसंधान में लड़का अपना कैरियर बनाने आया था उसके अध्यक्ष वही थे!
उस समय विक्रम साराभाई के नाम …