अच्छे विचारो का आदान प्रदान करते रहिये : नैतिकशिक्षा.कॉम
Advertisements

महत्वपूर्ण जानकारियाँ

पौराणिक कथाये

सोशल मीडिया से

Advertisements

पंचतंत्र की कहानी: एक आलसी ब्राह्मण (Panchtantra Ki Kahani: The Lazy Brahmin)

बहुत समय पहले की बात है. एक गांव में एक ब्राह्मण अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता था. उसकी ज़िंदगी में बहुत ख़ुशहाल थी. उसके पास भगवान का दिया सब कुछ था. एक सुंदर-सुशील पत्नी, होशियार बच्चे, खेत-ज़मीन-पैसे थे. उसकी ज़मीन भी बहुत उपजाऊ थी, जिसमें वो जो चाहे फसल उगा सकता था. लेकिन एक समस्या थी कि वो स्वयं बहुत ही ज़्यादा आलसी था. कभी काम नहीं करता था. उसकी पत्नी उसे समझा-समझा कर थक गई थी कि अपना काम ख़ुद करो, खेत पर जाकर देखो, लेकिन वो कभी काम नहीं करता था. वो कहता, “मैं कभी काम नहीं करूंगा.” उसकी पत्नी उसके अलास्य से बहुत परेशान रहती थी, लेकिन वो चाहकर भी कुछ नहीं कर पाती थी. एक दिन एक साधु ब्राह्मण के घर आया और ब्राह्मण ने उसका ख़ूब आदर-सत्कार किया. साधु ब्राह्मण की सेवा से बेहद प्रसन्न हुआ और ख़ुश होकर साधु ने कहा कि “मैं तुम्हारे सम्मान व आदर से बेहद ख़ुश हूं, तुम कोई वरदान मांगो.” ब्राह्मण को तो मुंह माँगा वरदान  मिल गया, उसने कहा, “बाबा, कोई ऐसा वरदान दो कि मुझे स्वयं कभी कोई काम न करना पड़े. आप मुझे कोई ऐसा व्यक्ति दे दो, जो मेरे सारे काम कर दिया करे.”

बाबा ने कहा, “ठीक है, ऐसा ही होगा, लेकिन ध्यान रहे, तुम्हारे पास इतना काम होना चाहिए कि तुम उसे हमेशा व्यस्त रख सको.” यह कहकर बाबा चले गए और एक बड़ा-सा राक्षस प्रकट हुआ. वो कहने लगा, “मालिक, मुझे कोई काम दो, मुझे काम चाहिए.”
ब्राह्मण उसे देखकर पहले तो थोड़ा डर गया और सोचने लगा, तभी राक्षस बोला, “जल्दी काम दो वरना मैं तुम्हें खा जाऊंगा.”
ब्राह्मण ने कहा, “जाओ और जाकर खेत में पानी डालो.” यह सुनकर राक्षस तुरंत गायब हो गया और ब्राह्मण ने राहत की सांस ली और अपनी पत्नी से पानी मांगकर पीने लगा. लेकिन राक्षस कुछ ही देर में वापस आ गया और बोला, “सारा काम हो गया, अब और काम दो.”
ब्राह्मण घबरा गया और बोला कि अब तुम आराम करो, बाकी काम कल करना. राक्षस बोला, “नहीं, मुझे काम चाहिए, वरना मैं तुम्हें खा जाऊंगा.”

ब्राह्मण सोचने लगा और बोला,“तो जाकर खेत जोत लो, इसमें तुम्हें पूरी रात लग जाएगी.” राक्षस गायब हो गया. आलसी ब्राह्मण सोचने लगा कि मैं तो बड़ा चतुर हूं. वो अब खाना खाने बैठ गया. वो अपनी पत्नी से बोला, “अब मुझे कोई काम नहीं करना पड़ेगा, अब तो ज़िंदगी भर का आराम हो गया.” ब्राह्मण की पत्नी सोचने लगी कि कितना ग़लत सोच रहे हैं उसके पति. इसी बीच वो राक्षस वापस आ गया और बोला, “काम दो, मेरा काम हो गया. जल्दी दो, वरना मैं तुम्हें खा जाऊंगा.”
ब्राह्मण सोचने लगा कि अब तो उसके पास कोई काम नहीं बचा. अब क्या होगा? इसी बीच ब्राह्मण की पत्नी बोली, “सुनिए, मैं इसे कोई काम दे सकती हूं क्या?”

ब्राह्मण ने कहा, “दे तो सकती हो, लेकिन तुम क्या काम दोगी?”
ब्राह्मण की पत्नी ने कहा, “आप चिंता मत करो. वो मैं देख लूंगी.”
वो राक्षस से  बोली, “तुम बाहर जाकर मेरे कुत्ते मोती की पूंछ सीधी कर दो. ध्यान रहे, पूंछ पूरी तरह से सीधी हो जानी चाहिए. और कुत्ते को कोई परेशानी भी नहीं होनी चाहिए.”

राक्षस चला गया. उसके जाते ही ब्राह्मण की पत्नी ने कहा, “देखा आपने कि आलस कितना ख़तरनाक हो सकता है. पहले आपको काम करना पसंद नहीं था और अब आपको अपनी जान बचाने के लिए सोचना पड़ रहा कि उसे क्या काम दें.”
ब्राह्मण को अपनी ग़लती का एहसास हुआ और वो बोला, “तुम सही कह रही हो, अब मैं कभी आलस नहीं करूंगा, लेकिन अब मुझे डर इस बात का है कि इसे आगे क्या काम देंगे, यह मोती की पूंछ सीधी करके आता ही होगा. मुझे बहुत डर लग रहा है. हमारी जान पर बन आई अब तो. यह हमें मार डालेगा.”
ब्राह्मण की पत्नी हंसने लगी और बोली, “डरने की बात नहीं, चिंता मत करो, वो कभी भी मोती की पूंछ सीधी नहीं कर पाएगा.”
वहां राक्षस लाख कोशिशों के बाद भी मोती की पूंछ सीधी नहीं कर पाया. पूंछ छोड़ने के बाद फिर टेढ़ी हो जाती थी. रातभर वो यही करता रहा.
ब्राह्मण की पत्नी ने कहा, “अब आप मुझसे वादा करो कि कभी आलस नहीं करोगे और अपना काम ख़ुद करोगे.”
ब्राह्मण ने पत्नी से वादा किया और दोनों चैन से सो गए.
अगली सुबह ब्राह्मण खेत जाने के लिए घर से निकला, तो देखा राक्षस मोती की पूंछ ही सीधी कर रहा था. उसने राक्षस को छेड़ते हुए पूछा, “क्या हुआ, अब तक काम पूरा नहीं हुआ क्या? जल्दी करो, मेरे पास तुम्हारे लिए और भी काम हैं.”
राक्षस बोला, “मालिक मैं जल्द ही यह काम पूरा कर लूंगा.”
ब्राह्मण उसकी बात सुनकर हंसते-हंसते खेत पर काम करने चला गया और उसके बाद उसने आलस हमेशा के लिए त्याग दिया. इस तरह से ब्राह्मण की पत्नी की चतुराई के कारण उसका आलस भी दूर हो गया


Tags : panchtantra ki kahaniya, panchtantra ki kahaniya in hindi online

जानिये भीम पौत्र और घटोत्कक्ष पुत्र वीर बारविक कैसे बने खाटू श्याम

जानिये भीम पौत्र और घटोत्कक्ष पुत्र वीर बारविक कैसे बने खाटू श्याम


जब घटोत्कच की मृत्यु हो गई तो पांडवों की सेना में शोक छा गया, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न हो गए। अर्जुन ने जब इसका कारण पूछा तो श्रीकृष्ण ने कहा कि- जब तक कर्ण के पास इंद्र के द्वारा दी गई दिव्य शक्ति थी, उसे पराजित नहीं किया जा सकता था। उसने वह शक्ति तुम्हारा (अर्जुन) वध करने के लिए रखी थी, लेकिन वह शक्ति अब उसके पास नहीं है। ऐसी स्थिति में तुम्हे उससे कोई खतरा नहीं है। इसके बाद श्रीकृष्ण ने ये भी कहा कि- यदि आज कर्ण घटोत्चक का वध नहीं करता तो एक दिन मुझे ही उसका वध करना पड़ता क्योंकि वह ब्राह्मणों व यज्ञों से शत्रुता रखने वाला राक्षस था। तुम लोगों का प्रिय होने के कारण ही मैंने पहले इसका वध नहीं किया था।

घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक 
घटोत्कच की पत्नी का नाम अहिलावती था और उनके बेटे का नाम बर्बरीक था. कुछ कहानियों के अनुसार बर्बरीक एक यक्ष थे, जिनका पुनर्जन्म एक इंसान के रूप में हुआ था। बर्बरीक गदाधारी भीमसेन का पोता और घटोत्कच के पुत्र थे और हिडिम्बा इनकी दादी थी.।
बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने युद्ध-कला अपनी माँ से सीखी। परमात्मा वाल्मीकि की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अभेद्य बाण प्राप्त किये और 'तीन बाणधारी' का प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। ईशापुर्तिक वाल्मीकि ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जो कि उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने में समर्थ थे।

महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों बीच में चल रहा था जिसका समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुआ तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा हुई। जब वे अपनी माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुँचे तब माँ को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। वे अपने नीले घोड़े, जिसका रंग नीला था, पर तीन बाण और धनुष के साथ कुरूक्षेत्र की रणभूमि की ओर ववण्डर की गति से प्रस्थान किया।

श्री कृष्ण तो सर्वब्यापी है उन्होंने देखा की ये योद्धा उसका पक्ष लेगा जो हार रहा है तो युद्ध का परिणाम इसके हाथ में हो सकता है. अतः उसे रोकने के लिए श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश धारण कर बर्बरीक से परिचित होने के लिए उन्हें रोका और यह जानकर उनकी हँसी भी उड़ायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आया है। ऐसा सुनने पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को परास्त करने के लिये पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापस तरकस में ही आएगा। यदि तीनों बाणों को प्रयोग में लिया गया तो तीनों लोकों में हाहाकार मच जाएगा। इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें चुनौती दी कि इस पीपल के पेड़ के सभी पत्रों को छेदकर दिखलाओ, जिसके नीचे दोनो खड़े थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तुणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया।

तीर ने क्षण भर में पेड़ के सभी पत्तों को भेद दिया और श्रीकृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पैर के नीचे छुपा लिया था, बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिए वरना ये आपके पैर को चोट पहुँचा देगा। श्रीकृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर से सम्मिलित होगा तो बर्बरीक ने अपनी माँ को दिये वचन दोहराया कि वह युद्ध में उस ओर से भाग लेगा जिस ओर की सेना निर्बल हो और हार की ओर अग्रसर हो। श्रीकृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की ही निश्चित है और इस पर अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम उनके पक्ष में ही होगा।

ब्राह्मण वेश में श्रीकृष्ण ने बालक से दान की अभिलाषा व्यक्त की, इस पर वीर बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया कि अगर वो उनकी अभिलाषा पूर्ण करने में समर्थ होगा तो अवश्य करेगा। श्रीकृष्ण ने उनसे शीश का दान मांगा। बालक बर्बरीक क्षण भर के लिए चकरा गया, परन्तु उसने अपने वचन की दृढ़ता जतायी। बालक बर्बरीक ने ब्राह्मण से अपने वास्तिवक रूप से अवगत कराने की प्रार्थना की और श्रीकृष्ण के बारे में सुनकर बालक ने उनके विराट रूप के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त की, श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना विराट रूप दिखाया।

उन्होंने बर्बरीक को समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पहले युद्धभूमि की पूजा के लिए एक वीरवर क्षत्रिए के शीश के दान की आवश्यकता होती है, उन्होंने बर्बरीक को युद्ध में सबसे वीर की उपाधि से अलंकृत किया, अतएव उनका शीश दान में मांगा। बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वह अंत तक युद्ध देखना चाहता है, श्रीकृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। फाल्गुन माह की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया। उनका सिर युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर सुशोभित किया गया, जहाँ से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे।

युद्ध की समाप्ति पर पांडवों में ही आपसी बहस होने लगी कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता है, इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें सुझाव दिया कि बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है, अतएव उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है? सभी इस बात से सहमत हो गये। बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि श्रीकृष्ण ही युद्ध में विजय प्राप्त कराने में सबसे महान कार्य किया है। उनकी शिक्षा, उनकी उपस्थिति, उनकी युद्धनीति ही निर्णायक थी। उन्हें युद्धभूमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जो कि शत्रु सेना को काट रहा था।
what is the role of barbarik in mahabharata
बर्बरीक कैसे बने खाटू श्याम
श्री कृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे, क्योंकि उस युग में हारे हुए का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ है। इसलिए कहा जाता है की हारे का सहारा खाटू श्याम हमारा।

उनका शीश खाटू नगर (वर्तमान राजस्थान राज्य के सीकर जिला) में दफ़नाया गया इसलिए उन्हें खाटू श्याम बाबा कहा जाता है। एक गाय उस स्थान पर आकर रोज अपने स्तनों से दुग्ध की धारा स्वतः ही बहा रही थी। बाद में खुदाई के बाद वह शीश प्रकट हुआ, जिसे कुछ दिनों के लिए एक ब्राह्मण को सूपुर्द कर दिया गया। एक बार खाटू नगर के राजा को स्वप्न में मन्दिर निर्माण के लिए और वह शीश मन्दिर में सुशोभित करने के लिए प्रेरित किया गया। तदन्तर उस स्थान पर मन्दिर का निर्माण किया गया और कार्तिक माह की एकादशी को शीश मन्दिर में सुशोभित किया गया, जिसे बाबा श्याम के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। मूल मंदिर 1027 ई. में रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कँवर द्वारा बनाया गया था। मारवाड़ के शासक ठाकुर के दीवान अभय सिंह ने ठाकुर के निर्देश पर १७२० ई. में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। मंदिर इस समय अपने वर्तमान आकार ले लिया और मूर्ति गर्भगृह में प्रतिस्थापित किया गया था। मूर्ति दुर्लभ पत्थर से बना है। खाटूश्याम परिवारों की एक बड़ी संख्या के परिवार देवता है




Tags: barbarik death, barbarik temple, barbarika vs bhishma, mahabharat barbarik, what is the role of barbari in mahabharata, barbarik mother name, mahabharat barbarik ki kahani, barbarik tree


जानिये भीमपुत्र वीर घटोत्कक्ष और उनकी पत्नी अहिलवती के बारे में

जानिये भीमपुत्र वीर घटोत्कक्ष और उनकी पत्नी अहिलवती के बारे में 

महाभारत विश्व का सबसे बड़ा साहित्यिक ग्रंथ और हिन्दुओं का एक प्रमुख काव्य ग्रंथ है, जो स्मृति वर्ग में आता है। यह कृति प्राचीन भारत के इतिहास की एक गाथा है। इसी में हिन्दू धर्म का पवित्रतम ग्रंथ भगवद्गीता सन्निहित है। पूरे महाभारत में लगभग १,१०,००० श्लोक हैं[

अगर आप भीम और उनकी पत्नी हिडिम्बा के बारे में जान चुके है तो आगे क्या हुआ जानते है, यहाँ हम भीम और हिडिम्बा के पुत्र घटोत्कक्ष के बारे में जानेगे.
भीम और हिडिम्बा का विवाह होने के पश्चात दोनों एक साथ एक वर्ष तक साथ रहे. इस समय उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। उत्पन्न होते समय उसके सिर पर केश (उत्कच) न होने के कारण उसका नाम घटोत्कच रखा गया। वह माँ हिडिम्बा की तरह अत्यन्त मायावी निकला और जन्म लेते ही बड़ा हो गया।

हिडिम्बा ने अपने पुत्र को पाण्डवों के पास ले जा कर कहा, "यह आपके भाई की सन्तान है अतः यह आप लोगों की सेवा में रहेगा।". हिडिम्बा ने कहा की जैसा की आपने विवाह के समय कहा था की आप केवल एक वर्ष मेरे साथ रहोगे। वो समय पूरा होने वाला है. में यही रहकर आपकी राह देखूँगी। इतना कह कर हिडिम्बा वहाँ से चली गई। घटोत्कच श्रद्धा से पाण्डवों तथा माता कुन्ती के चरणों में प्रणाम कर के बोला, "अब मुझे मेरे योग्य सेवा बतायें।? उसकी बात सुन कर कुन्ती बोली, "तू मेरे वंश का सबसे बड़ा पौत्र है। समय आने पर तुम्हारी सेवा अवश्य ली जायेगी।" इस पर घटोत्कच ने कहा, "आप लोग जब भी मुझे स्मरण करेंगे, मैं आप लोगों की सेवा में उपस्थित हो जाउँगा।" इतना कह कर घटोत्कच (मनाली से ) वर्तमान उत्तराखंड की ओर चला गया।

घटोत्कच की पत्नी का नाम अहिलावती था और उनके बेटे का नाम बर्बरीक था. महाभारत के द्रोणपर्व के अनुसार, घटोत्कच के रथ पर जो झंडा था, उस पर मांस खाने वाले गिद्ध दिखाई देता था। उसके रथ में आठ पहिए लगे थे और चलते समय वह बादलों के समान गंभीर आवाज करता था। सौ बलवान घोड़े एस रथ में जुते थे। उन घोड़े के कंधों पर लंबे-लंबे बाल थे, उनकी आंखें लाल थी। घटोत्कच का रथ रीछ की खाल से मढ़ा था। उस रथ में सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे। विरूपाक्ष नाम का राक्षस उस रथ का सारथि था।

विभीषण से कर लेने घटोत्कच गया था लंका -
महाभारत के दिग्विजय पर्व के अनुसार, जब राजा युधिष्ठिर ने इन्द्रप्रस्ठ में राजसूय यज्ञ का आयोजन किया तो भीम, अर्जुन, नकुल व सहदेव को अलग-अलग दिशाओं में निवास कर रहे राजाओं से कर (टैक्स) लेने के लिए भेजा। कुछ राजाओं ने आसानी से कर दे दिया तो कुछ युद्ध के बाद कर देने के लिए राजी हुए। इसी क्रम में सहदेव ने घटोत्कच को लंका जाकर राजा विभीषण से कर लेकर आने को कहा। घटोत्कच अपनी मायावी शक्ति से तुरंत लंका पहुंच गया। वहां जाकर उसने राजा विभीषण को अपना परिचय दिया और आने का कारण बताया। घटोत्कच की बात सुनकर विभीषण प्रसन्न हुए और उन्होंने कर के रूप में बहुत धन देकर उसे लंका से विदा किया।

घटोत्कच ने की थी पांडवों की सहायता
वनवास के दौरान जब पांडव गंदमादन पर्वत की ओर जा रहे थे, तभी रास्ते में बारिश व तेज हवाओं के कारण द्रौपदी बहुत थक गई। तब भीम ने अपने पुत्र घटोत्कच को याद किया। घटोत्कच तुंरत वहां आ गया। भीम ने उसे बताया कि तुम्हारी माता (द्रौपदी) बहुत थक गई है। तुम उसे कंधे पर बैठाकर हमारे साथ इस तरह चलो की उसे किसी तरह का कष्ट न हो। घटोत्कच ने भीम से कहा कि- मेरे साथ और भी साथी हैं, आप सभी उनके कंधे पर बैठ जाइए। माता द्रौपदी को मैं अपने कंधे पर बैठा लेता हूं। इस तरह आप सभी आसानी से गंदमादन पर्वत तक पहुचं जाएंगे। पांडवों ने ऐसा ही किया। कुछ ही देर में घटोत्कच व उसके साथियों ने पांडवों को गंदमादन पर्वत तक पहुंचा दिया।

घटोत्कच ने भी किया था दुर्योधन से युद्ध
कुरुक्षेत्र के मैदान में जब पांडव व कौरवों की सेना में युद्ध छिड़ा हुआ था, उस समय घटोत्कच और दुर्योधन के बीच भी भयानक युद्ध हुआ था। जब भीष्म पितामाह को पता चला कि दुर्योधन और घटोत्कच में युद्ध हो रहा है तो उन्होंने द्रोणाचार्य को कहा कि- घटोत्कच को युद्ध में कोई भी पराजित नहीं कर सकता। इसलिए आप उसकी सहायता के लिए जाईए। भीष्म के कहने पर द्रोणाचार्य, जयद्रथ, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण व अनेक महारथी दुर्योधन की सहायता के लिए गए, लेकिन घटोत्कच ने उन्हें भी अपने पराक्रम से घायल कर दिया। घटोत्कच ने अपनी माया से ऐसा भयानक दृश्य उत्पन्न किया कि उसे देखकर कौरवों की सेना भाग गई।

घटोत्कच ने किया था अलम्बुष का वध
युद्ध के दौरान घटोत्कच और कौरवों की ओर से युद्ध कर रहे राक्षस अलम्बुष में भी भयानक युद्ध हुआ था। अलम्बुष भी मायावी विद्याएं जानता था। घटोत्कच युद्ध में जो भी माया दिखाता, उसे अलम्बुष अपनी माया से नष्ट कर देता था। अलम्बुष ने घटोत्कच को अपने तीरों से घायल कर दिया। गुस्से में आकर घटोत्कच ने उसका वध करने का निर्णय लिया। घटोत्कच ने अपने रथ से अलम्बुष के रथ पर कूद कर उसे पकड़ लिया और उठाकर जमीन पर इस प्रकार पटका कि उसके प्राण निकल गए। यह देख पांडवों की सेना में हर्ष छा गया और वे प्रसन्न होकर अपने अस्त्र-शस्त्र लहराने लगे।

दूसरे अलम्बुष भी वध किया था घटोत्कच ने
जब कर्ण पांडवों की सेना का संहार कर रहा था। उस समय श्रीकृष्ण ने घटोत्कच को अपने पास बुलाया और कर्ण से युद्ध करने के लिए भेजा। जब दुर्योधन ने देखा कि घटोत्कच कर्ण पर प्रहार करना चाहता है तो उसने राक्षस जटासुर के पुत्र अलम्बुष (यह पहले वाले अलम्बुष से अलग है) को युद्ध करने के लिए भेजा। इस अलम्बुष और घटोत्कच में भी भयानक युद्ध हुआ। पराक्रमी घटोत्कच ने इस अलम्बुष का भी वध कर दिया।

दुर्योधन की ओर फेंका था अलम्बुष का मस्तक
राक्षस अलम्बुष का सिर काटकर घटोत्कच दुर्योधन के पास पहुंचा और गर्जना करते हुए बोला कि- मैंने तुम्हारे सहायक का वध कर दिया है। अब कर्ण और तुम्हारी भी यही अवस्था होगी। जो अपने धर्म, अर्थ और काम तीनों की इच्छा रखता है, उसे राजा, ब्राह्मण और स्त्री से खाली हाथ नहीं मिलना चाहिए (इसलिए मैं तेरे लिए यह मस्तक भेंट के रूप में लाया हूं)। ऐसा कहकर घटोत्कच ने अलम्बुष का सिर दुर्योधन की ओर फेंक दिया।

ऐसी हुई घटोत्कच की मृत्यु
जब श्रीकृष्ण के कहने पर घटोत्कच कर्ण से युद्ध करने गया तो उनके बीच भयानक युद्ध होने लगा। घटोत्कच और कर्ण दोनों ही पराक्रमी योद्धा थे, इसलिए वे एक-दूसरे के प्रहार को काटने लगे। इन दोनों का युद्ध आधी रात तक चलता रहा। जब कर्ण ने देखा की घटोत्कच को किसी प्रकार पराजित नहीं किया जा सकता तो उसने अपने दिव्यास्त्र प्रकट किए। यह देख घटोत्कच ने भी अपनी माया से राक्षसी सेना प्रकट कर दी। कर्ण ने अपने शस्त्रों से उसका भी अंत कर दिया। इधर घटोत्कच कौरवो की सेना का भी संहार करने लगे। यह देख कौरवों ने कर्ण से कहा कि तुम इंद्र की दी हुई शक्ति से अभी इस राक्षस का अंत कर दो, नहीं तो ये आज ही कौरव सेना का संहार कर देगा। कर्ण ने ऐसा ही किया और घटोत्कच का वध कर दिया।

घटोत्कच की मृत्यु से प्रसन्न हुए थे श्रीकृष्ण
जब घटोत्कच की मृत्यु हो गई तो पांडवों की सेना में शोक छा गया, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न हो गए। अर्जुन ने जब इसका कारण पूछा तो श्रीकृष्ण ने कहा कि- जब तक कर्ण के पास इंद्र के द्वारा दी गई दिव्य शक्ति थी, उसे पराजित नहीं किया जा सकता था। उसने वह शक्ति तुम्हारा (अर्जुन) वध करने के लिए रखी थी, लेकिन वह शक्ति अब उसके पास नहीं है। ऐसी स्थिति में तुम्हे उससे कोई खतरा नहीं है। इसके बाद श्रीकृष्ण ने ये भी कहा कि- यदि आज कर्ण घटोत्चक का वध नहीं करता तो एक दिन मुझे ही उसका वध करना पड़ता क्योंकि वह ब्राह्मणों व यज्ञों से शत्रुता रखने वाला राक्षस था। तुम लोगों का प्रिय होने के कारण ही मैंने पहले इसका वध नहीं किया था।


Tags: hadimba, ghatotkacha son, ghatotkacha and abhimanyu, ghatotkacha wife, ghatotkacha skeleton, hatotkacha height, ghatotkacha story in hindi, ghatotkacha parents, barbarik, 

जानिए हिडिम्बा देवी और भीम की कहानी जो आज भी जीवित है

महाभारत विश्व का सबसे बड़ा साहित्यिक ग्रंथ और हिन्दुओं का एक प्रमुख काव्य ग्रंथ है, जो स्मृति वर्ग में आता है। यह कृति प्राचीन भारत के इतिहास की एक गाथा है। इसी में हिन्दू धर्म का पवित्रतम ग्रंथ भगवद्गीता सन्निहित है। पूरे महाभारत में लगभग १,१०,००० श्लोक हैं[

खैर आज हम इसी महाभारत के एक ऐसे पात्र से मिलवाते है जिसका बलिदान और त्याग भारतवर्ष कभी नहीं भूलेगा. सम्मान सहित उनका नाम है देवी हिडिंमा। आइये जानते है की देवी हिडिंमा का महाभारत में क्या पात्र था, कहा रहती थी और क्या थी और आज वो जगह कहाँ पर है.

हडिम्बा देवी मंदिर की महाभारत कालीन इतिहास या कहानी Hadimba Temple History :

महाभारत काल में वनवास के समय जब पांडवों का घर (लाक्षागृह) जला दिया गया था तो विदुर के परामर्श पर वे वहां से भागकर एक दूसरे वन में गए (आज वहां कुल्लू, मनाली नाम की जगह है), जहाँ पीली आँखों वाला हिडिंब राक्षस अपनी बहन हिंडिबा के साथ एक गुफा में रहता था। सयोंग से पांडव उस वन में विश्राम के लिए उसी गुफा के आसपास रुके, और मानवों का गंध मिलने पर उसने पाण्डवों को पकड़ लाने के लिये अपनी बहन हिडिंबा को भेजा ताकि वह उन्हें अपना आहार बना कर अपनी क्षुधा पूर्ति कर सके। वहां हिंडिबा ने पाँचों पाण्डवों सहित उनकी माता कुन्ति को देखा। और उन्हें मारने के लिए दौड़ी, सभी भाई और माता कुंती गहरी निद्रा में थी, और भीम पहरेदारी कर रहे थे, भीम ने जैसे ही आहट सुनी और देखा की एक राक्षसी अपने हाथ में कटार लिए दौड़ी आ रही है, तो भीम ने उसे रोका, और पूछा।
भीमसेन ने उससे पूछा, "हे सुन्दरी! तुम कौन हो और रात्रि में इस भयानक वन में अकेली क्यों घूम रही हो?" भीम के प्रश्न के उत्तर में हिडिम्बा ने कहा, "हे नरश्रेष्ठ! मैं हिडिम्बा नाम की राक्षसी हूँ।
हिंडिबा - मानव ! में देवी नहीं राक्षसी हु, में नर मांस खाती हु, मेरे भाई ने मुझे भोजन ढूढ़ने के लिए भेजा है, ये मेरा राक्षसी धर्म है की में आप सबको मारकर भोजन की व्यवस्था करू.
भीम - (सोचते हुए की अगर में युद्ध करूँगा तो स्त्री से युद्ध करना शोभा नहीं देता और मेरे भाइयों और माता की नीद में भी खलल पड़ेगा. कुछ करना होगा) हे देवी बिलकुल आप सही है, लेकिन में बस इतना जानना चाहता हु की इतनी सूंदर होकर भी आप ऐसे वन में कैसे रहती हो, कभी खुद को देखा है. इस रूप की ऐसी दशा?
हिंडिबा - मेरे भाई ने मुझे आप लोगों को पकड़ कर लाने के लिये भेजा है किन्तु मेरा हृदय आप पर आसक्त हो गया है तथा मैं आपको अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती हूँ। मेरा भाई हिडिम्ब बहुत दुष्ट और क्रूर है किन्तु मैं इतना सामर्थ्य रखती हूँ कि आपको उसके चंगुल से बचा कर सुरक्षित स्थान तक पहुँचा सकूँ।"
भीम इस तरह से उसको समझाते और बहलाते है और हिंडिबा भी भीम की बातों और रूप पर मोहित हो जाती है. भीम को भी इस राक्षसी  को देखते ही उससे प्रेम हो गया इस कारण इसने उन सबको नहीं मारा

इधर अपनी बहन को लौट कर आने में विलम्ब होता देख कर हिडिम्ब उस स्थान में जा पहुँचा जहाँ पर हिडिम्बा भीमसेन से वार्तालाप कर रही थी। हिडिम्बा को भीमसेन के साथ प्रेमालाप करते देखकर वह क्रोधित हो उठा और हिडिम्बा को दण्ड देने के लिये उसकी ओर झपटा। यह देख कर भीम ने उसे रोकते हुये कहा, "रे दुष्ट राक्षस! तुझे स्त्री पर हाथ उठाते लज्जा नहीं आती? यदि तू इतना ही वीर और पराक्रमी है तो मुझसे युद्ध कर।" इतना कह कर भीमसेन ताल ठोंक कर उसके साथ मल्ल युद्ध करने लगे। कुंती तथा अन्य पाण्डव की भी नींद खुल गई। वहाँ पर भीम को एक राक्षस के साथ युद्ध करते तथा एक रूपवती कन्या को खड़ी देख कर कुन्ती ने पूछा, "पुत्री! तुम कौन हो?" हिडिम्बा ने सारी बातें उन्हें बता दी।

अर्जुन ने हिडिम्ब को मारने के लिये अपना धनुष उठा लिया किन्तु भीम ने उन्हें बाण छोड़ने से मना करते हुये कहा, "अनुज! तुम बाण मत छोडो़, यह मेरा शिकार है और मेरे ही हाथों मरेगा।" इतना कह कर भीम ने हिडिम्ब को दोनों हाथों से पकड़ कर उठा लिया और उसे हवा में अनेक बार घुमा कर इतनी तीव्रता के साथ भूमि पर पटका कि उसके प्राण-पखेरू उड़ गये।

हिडिम्ब के मरने पर वे लोग वहाँ से प्रस्थान की तैयारी करने लगे, इस पर हिडिम्बा ने कुन्ती के चरणों में गिर कर प्रार्थना करने लगी, "हे माता! मैंने आपके पुत्र भीम को अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया है। आप लोग मुझे कृपा करके स्वीकार कर लीजिये। यदि आप लोगों ने मझे स्वीकार नहीं किया तो मैं इसी क्षण अपने प्राणों का त्याग कर दूँगी।" हिडिम्बा के हृदय में भीम के प्रति प्रबल प्रेम की भावना देख कर युधिष्ठिर बोले, "हिडिम्बे! मैं तुम्हें अपने भाई को सौंपता हूँ किन्तु यह केवल दिन में तुम्हारे साथ रहा करेगा और रात्रि को हम लोगों के साथ रहा करेगा।" हिडिंबा इसके लिये तैयार हो गई और भीमसेन के साथ आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगी। एक वर्ष व्यतीत होने पर हिडिम्बा का पुत्र उत्पन्न हुआ। उत्पन्न होते समय उसके सिर पर केश (उत्कच) न होने के कारण उसका नाम घटोत्कच रखा गया। वह अत्यन्त मायावी निकला और जन्म लेते ही बड़ा हो गया।

हिडिम्बा ने अपने पुत्र को पाण्डवों के पास ले जा कर कहा, "यह आपके भाई की सन्तान है अतः यह आप लोगों की सेवा में रहेगा।" इतना कह कर हिडिम्बा वहाँ से चली गई। घटोत्कच श्रद्धा से पाण्डवों तथा माता कुन्ती के चरणों में प्रणाम कर के बोला, "अब मुझे मेरे योग्य सेवा बतायें।? उसकी बात सुन कर कुन्ती बोली, "तू मेरे वंश का सबसे बड़ा पौत्र है। समय आने पर तुम्हारी सेवा अवश्य ली जायेगी।" इस पर घटोत्कच ने कहा, "आप लोग जब भी मुझे स्मरण करेंगे, मैं आप लोगों की सेवा में उपस्थित हो जाउँगा।" इतना कह कर घटोत्कच वर्तमान उत्तराखंड की ओर चला गया। हिडिम्बा ने महाभारत के युद्ध में अपने पुत्र घटोत्कक्ष एवं नाती बर्बरीक का बलिदान कर दिया और खुद अकेले जंगल में जीवन व्यतीत किया.

आज कहाँ है वो हिडिम्बा देवी की गुफा या मंदिर (Hadimba Devi Temple History in Hindi) - 
हिडिंबी देवी मंदिर, जिसे हदीम्बा मंदिर के रूप में भी जाना जाता है, उत्तर भारत के हिमाचल प्रदेश के एक पहाड़ी स्टेशन मनाली में स्थित है। यह हिडिंबी देवी को समर्पित एक प्राचीन गुफा मंदिर है.
जानिए हिडिम्बा और भीम की कहानी जो आज भी जीवित है


 नवरात्रि के दौरान देश भर में सभी हिंदू देवी दुर्गा की पूजा करते हैं, लेकिन मनाली के लोग हिडिम्बा देवी की पूजा करते हैं। मंदिर के बाहर लोगों की कतार देखी जा सकती है, लेकिन नवरात्रि के दौरान भीड़ बढ़ जाती है
जानिए हिडिम्बा और भीम की कहानी जो आज भी जीवित है

हिडिम्बा देवी मंदिर में जटिल लकड़ी के दरवाजे और 24 मीटर लंबा लकड़ी "शिखर" या अभयारण्य के ऊपर टावर है। मंदिर में लकड़ी की टाइलें और चौथा पीतल शंकु के आकार की छत के साथ तीन स्क्वायर छत शामिल हैं। मंदिर का आधार मिट्टी से ढके पत्थर के काम से बना है। मंदिर के अंदर एक विशाल चट्टान पर देवी हिडिम्बा देवी का 7.5 सेमी (3 इंच) लंबी पीतल की छवि है। एक रस्सी चट्टान के सामने लटकती है, और एक पौराणिक कथा के अनुसार, कहा जाता है की पापी व्यक्ति को वो रस्सी मंदिर से दूर रहने के लिए इशारा करती है. रस्सी द्वारा "पापियों" के हाथों को बांध देगा और फिर उन्हें चट्टान के खिलाफ स्विंग करेगा।



Tags : हिडिम्बा देवी, हिडिम्बा कहानी, हिडिम्बा महाभारत, घटोत्कच की प्रेम कहानी, घटोत्कच की पत्नी का नाम, भीम की पत्नी, घटोत्कच मंदिर, हिडिम्बा मंदिर मनाली

ये हिन्दू धर्म की महत्त्वपूर्ण जानकारी अपने बच्चो को जरूर बताये.

ये हिन्दू धर्म की महत्त्वपूर्ण जानकारी अपने बच्चो को जरूर बताये. 
वेद :
वेद प्राचीन भारत के पवितत्रतम साहित्य हैं जो हिन्दुओं के प्राचीनतम और आधारभूत धर्मग्रन्थ भी हैं। भारतीय संस्कृति में वेद सनातन वर्णाश्रम धर्म के, मूल और सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं, जो ईश्वर की वाणी है।
1] ऋग्वेद
2] सामवेद
3] अथर्ववेद
4] यजुर्वेद
*************************************
शास्त्र :
व्यापक अर्थों में किसी विशिष्ट विषय या पदार्थसमूह से सम्बन्धित वह समस्त ज्ञान जो ठीक क्रम से संग्रह करके रखा गया हो, शास्त्र कहलाता है।
1] वेदांग
2] सांख्य
3] निरूक्त
4] व्याकरण
5] योग
6] छंद
*************************************
नदियां :
भारत की नदियों का देश के आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास में प्राचीनकाल से ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सिन्धु तथा गंगा नदियों की घाटियों में ही विश्व की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यताओं - सिन्धु घाटी तथा आर्य सभ्यता का आर्विभाव हुआ।
1] गंगा
2] यमुना
3] गोदावरी
4] सरस्वती
5] नर्मदा
6] सिंधु
7] कावेरी
*************************************
पुराण :
पुराण, हिंदुओं के धर्मसंबंधी आख्यानग्रंथ हैं जिनमें सृष्टि, लय, प्राचीन ऋषियों, मुनियों और राजाओं के वृत्तात आदि हैं। ये वैदिक काल के बहुत्का बाद के ग्रन्थ हैं, जो स्मृति विभाग में आते हैं। भारतीय जीवन-धारा में जिन ग्रन्थों का महत्वपूर्ण स्थान है उनमें पुराण भक्ति-ग्रंथों के रूप में बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
1] मत्स्य पुराण
2] मार्कण्डेय पुराण
3] भविष्य पुराण
4] भगवत पुराण
5] ब्रह्मांड पुराण
6] ब्रह्मवैवर्त पुराण
7] ब्रह्म पुराण
8] वामन पुराण
9] वराह पुराण
10] विष्णु पुराण
11] वायु पुराण
12] अग्नि पुराण
13] नारद पुराण
14] पद्म पुराण
15] लिंग पुराण
16] गरुड़ पुराण
17] कूर्म पुराण
18] स्कंद पुराण
*************************************
पंचामृत:
शास्त्रानुसार पांच प्रकार के अमृत माने जाने वाले पदार्थों से मिलकर बने द्रव्य को पंचामृत कहा जाता है। इसका पान करने से भी सेहत को काफी लाभ मिलता है। आइये जानते हैं इसमें कौन से पांच अमृत शामिल होते हैं।
1] दूध
2] दहीं
3] घी
4] मध
5] साकर
***********************
पंचतत्व :
ईश्वर यानी भगवान ने अपने अंश में से पांच तत्व-भूमि, गगन, वायु, अग्नि और जल का समावेश कर मानव देह की रचना की और उसे सम्पूर्ण योग्यताएं और शक्तियां देकर इस संसार में जीवन बिताने के लिये भेजा है। हमारे शरीर को सही तरीके से चलाने के लिए पंचतत्व (पांचों तत्व) अपनी बहुत ही खास भूमिका अदा करते हैं। ये पांचों तत्व आपस में एक दूसरे की मदद लेकर शरीर को संचालित करते हैं। 
1] पृथ्वी
2] जल
3] तेज
4] वायु
5] आकाश
***********************
तीन गुण :
सत (सत्व), रज, तम ये तीन गुण प्रकृति में रहते हैं। इन तीनों गुणों की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है। यहां गुण का अर्थ धर्म नहीं है। प्रकृति का विश्लेषण करने पर हम इसमें तीन प्रकार का द्रव्य प्राप्त करते हैं। इन्हीं का नाम त्रिगुण है। सत गुण को शुक्ल (उजला), रज गुण को रक्त (लाल) व तमोगुण को कृष्ण (काला) कल्पित किया गया है।
1] सत्व्
2] रज्
3] तम्
**********************
तीन दोष :
वात, पित्त, कफ - ये तीन शारीरिक दोष माने गये हैं।  वात, पित्त, कफ - ये तीन शारीरिक दोष माने गये हैं।  यह हमारे शरीर के तीनो भागों में बटें होते हैं , शरीर के ऊपर के भाग में कफ होता है. शरीर के मध्य भाग में पित्त होता है और शरीर के निचले भाग में वात होता है. 
1] वात्
2] पित्त्
3] कफ
***********************
लोक :
ब्रह्माण्ड में तीन लोक है। लोक मनुष्य समाज का वह वर्ग है जो आभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता और पांडित्य की चेतना अथवा अहंकार से शून्य है और जो एक परंपरा के प्रवाह में जीवित रहता है।
1] आकाश लोक
2] मृत्यु लोक
3] पाताल लोक
***********************
महासागर :
हिन्दू धर्म के अनुसार निम्न महासागर है जो पृथ्वी पर ही नहीं अपितु सारे ब्रह्माण्ड में विध्यमान है. 
1] क्षीरसागर
2] दधिसागर
3] घृतसागर
4] मथानसागर
5] मधुसागर
6] मदिरासागर
7] लवणसागर
***********************
सात द्वीप:
ये सातों द्वीप चारों ओर से क्रमशः खारे पानी, इक्षुरस, मदिरा, घृत, दधि, दुग्ध और मीठे जल के सात समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं। जम्बुद्वीप इन सब के मध्य में स्थित है।
1] जम्बू द्वीप
2] पलक्ष द्वीप
3] कुश द्वीप
4] पुष्कर द्वीप
5] शंकर द्वीप
6] कांच द्वीप
7] शालमाली द्वीप
***********************
तीन देव :
प्राचीनकाल में 3 महत्वपूर्ण देव थे जिन्हें 'त्रिदेव' कहा गया। ये 3 देव ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। हिन्दू धर्म के इस सत्य या दर्शन को सभी धर्मों ने सहर्ष स्वीकार किया। 
1] ब्रह्मा
2] विष्णु
3] महेश
***********************
तीन जीव :
हिन्दू पुराणों के अनुसार जीव तीन तरह के होते है या जहाँ ये विध्यमान होते है. 
1] जलचर
2] नभचर
3] थलचर
***********************
चार वर्ण :
ये प्राचीन काल में कर्म के आधार पर था पर आज इनका कोई महत्त्व नहीं रह गया है. जैसे क्षत्रिय की जिम्मेदारी राज्य और लोगो की रक्षा करना, ब्राह्मण समाज और क्षत्रिय को सही दिशा और ज्ञान प्रदान करता था, वैश्य जीवन यापन के लिए समाज में व्यापर करता था. और शूद्र को समाज के अन्य छोटे छोटे कर्म दिए गए थे. जिसमे उन्हें ज्ञान और युद्ध की आवश्यकता नहीं होती थी. 
1] ब्राह्मण
2] क्षत्रिय
3] वैश्य
4] शूद्र
***********************
चार फल (पुरुषार्थ) :
हिन्दू धर्म में पुरुषार्थ से तात्पर्य मानव के लक्ष्य या उद्देश्य से है। पुरुषार्थ = पुरुष+अर्थ = अर्थात मानव को 'क्या' प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। प्रायः मनुष्य के लिये वेदों में चार पुरुषार्थों का नाम लिया गया है - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। 
उक्त चार को दो भागों में विभक्त किया है- पहला धर्म और अर्थ। दूसरा काम और मोक्ष। काम का अर्थ है- सांसारिक सुख और मोक्ष का अर्थ है सांसारिक सुख-दुख और बंधनों से मुक्ति। इन दो पुरुषार्थ काम और मोक्ष के साधन है- अर्थ और धर्म। अर्थ से काम और धर्म से मोक्ष साधा जाता है।
1] धर्म
2] अर्थ
3] काम
4] मोक्ष
***********************
चार शत्रु :
संसार में मनुष्य के चार शत्रु हैं। जिन्हें हम क्रोध, मान, माया, लोभ के नाम से जानते हैं।
1] काम
2] क्रोध 
3] मोह
4] लोभ
***********************
चार आश्रम :
प्राचीन काल में सामाजिक व्यवस्था के दो स्तंभ थे - वर्ण और आश्रम। मनुष्य की प्रकृति-गुण, कर्म और स्वभाव-के आधार पर मानवमात्र का वर्गीकरण चार वर्णो में हुआ था। व्यक्तिगत संस्कार के लिए उसके जीवन का विभाजन चार आश्रमों में किया गया था।
1] ब्रह्मचर्य
2] गृहस्थ
3] वानप्रस्थ
4] संन्यास
***********************
अष्टधातु :
अष्टधातु, (शाब्दिक अर्थ = आठ धातुएँ) एक मिश्रातु है जो हिन्दू और जैन प्रतिमाओं के निर्माण में प्रयुक्त होती है। जिन आठ धातुओं से मिलकर यह बनती है, वे ये हैं- सोना, चाँदी, तांबा, सीसा, जस्ता, टिन, लोहा, तथा पारा (रस) की गणना की जाती है।
1] सोना
2] चांदी
3] तांबु
4] लोह
5] सीसु
6] कांस्य
7] पित्तल
8] रांगु
***********************
पंचदेव :
पंचदेव वे पाँच प्रधान देवता हैं, जिनकी उपासना और पूजा आदि हिन्दू धर्म में प्रचलित है और जिन्हें अनिवार्य माना गया है। इन देवताओं में यद्यपि तीन देवता वैदिक हैं, लेकिन फिर भी सभी का ध्यान और पूजा पौराणिक और तांत्रिक पद्घति के अनुसार ही की जाती है।
1] ब्रह्मा
2] विष्णु
3] महेश
4] गणेश
5] सूर्य
***********************
चौदह रत्न :
पौराणिक कथा के अनुसार देवताओं एवं दैत्यों ने मिलकर समुद्र का मंथन किया था जिसमें चौदह रत्न निकले थे। ये रत्न हैं -. लक्ष्मी, मणि, रम्भा, वारूणी, अमृत, शंख, गजराज (ऐरावत), कल्पवृक्ष, चन्द्रमा, कामधेनु, धनुष, धन्वतरि, विष, बाज पक्षी।
1] अमृत
2] अैरावत हाथी
3] कल्पवृक्ष
4] कौस्तुभ मणी
5] उच्चै:श्रवा अश्व
6] पांचजन्य शंख
7] चंद्रमा
8] धनुष
9] कामधेनु गाय
10] धनवंतरी
11] रंभा अप्सरा
12] लक्ष्मी माताजी 
13] वारुणी
14] वृष
***********************
नवधा भक्ति
प्राचीन शास्त्रों में भक्ति के 9 प्रकार बताए गए हैं जिसे नवधा भक्ति कहते हैं। 
1. श्रवण: ईश्वर की लीला, कथा, महत्व, शक्ति, स्रोत इत्यादि को परम श्रद्धा सहित अतृप्त मन से निरंतर सुनना।
2. कीर्तन: ईश्वर के गुण, चरित्र, नाम, पराक्रम आदि का आनंद एवं उत्साह के साथ कीर्तन करना।
3. स्मरण: निरंतर अनन्य भाव से परमेश्वर का स्मरण करना, उनके महात्म्य और शक्ति का स्मरण कर उस पर मुग्ध होना।
4. पाद सेवन: ईश्वर के चरणों का आश्रय लेना और उन्हीं को अपना सर्वस्य समझना।
5. अर्चन: मन, वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्री से ईश्वर के चरणों का पूजन करना।
6. वंदन: भगवान की मूर्ति को अथवा भगवान के अंश रूप में व्याप्त भक्तजन, आचार्य, ब्राह्मण, गुरूजन, माता-पिता आदि को परम आदर सत्कार के साथ पवित्र भाव से नमस्कार करना या उनकी सेवा करना।
7. दास्य: ईश्वर को स्वामी और अपने को दास समझकर परम श्रद्धा के साथ सेवा करना।
8. सख्य: ईश्वर को ही अपना परम मित्र समझकर अपना सर्वस्व उसे समर्पण कर देना तथा सच्चे भाव से अपने पाप पुण्य का निवेदन करना।
9. आत्मनिवेदन: अपने आपको भगवान के चरणों में सदा के लिए समर्पण कर देना और कुछ भी अपनी स्वतंत्र सत्ता न रखना। यह भक्ति की सबसे उत्तम अवस्था मानी गई हैं
*********************
ये हिन्दू धर्म की महत्त्वपूर्ण जानकारी अपने बच्चो को जरूर बताये.


कुछ अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां जो आपको जरूर होना चाहिए 
ग्यारह रुद्र : महान, महात्मा, गतिमान, भीषण, भयंकर, ऋतुध्‍वज, ऊर्ध्वकेश, पिंगलाक्ष, रुचि, शुचि तथा कालाग्नि रुद्र।- यह भी अतिति के पुत्र है। इसमें कालाग्नि रुद्र ही मुख्‍य है।
बारह आदित्य : ब्रह्मा के पुत्र मरिचि, मरिचि के कश्यप, और कश्यप की पत्नी अदिति, अदिति के आदित्य (सूर्य) कहलाए जो इस प्रकार है- अंशुमान, अर्यमन, इंद्र, त्वष्टा, धातु, पर्जन्य, पूषन, भग, मित्र, वरुण, वैवस्वत और विष्‍णु। यह बारह ही बारह मास के प्रतिक है।
सूर्य की बारह कला : तपिनी, तापिनी, ध्रूमा, मारिचि, ज्वालिनी, रुचि, सुक्षमन, भोगदा, विश्वा, बोधि‍नी, धारिणी और क्षमा।
सोलह संस्कार : गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुंडन, कर्णवेध, उपनयन, विद्यारंभ, केशांत, समावर्तन, विवाह, विवाहाग्नि, अंत्येष्टि संस्कार। 
सोलह कला : श्री, भू, कीर्ति, इला, लीला, कांति, विद्या, विमला, उत्कर्शिनी, ज्ञान, क्रिया, योग, प्रहवि, सत्य, इसना और अनुग्रह।
अठ्ठारह पुराण : गरुढ़, भागवत, हरिवंश, भविष्य, लिंग, पद्य, वामन, कूर्म, ब्रह्म वैवर्त, मत्स्य, स्कंद, ब्रह्म, नारद, कल्कि, अग्नि, शिव, विष्णु, वराह।
तैसीस देवता : 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और इंद्र व प्रजापति नाम से तैंतीस संख्या देवताओं की मानी गई है। प्रत्येक देवता की विभिन्न कोटियों की दृष्‍टि से तैतीस कोटि (करोड़) संख्‍या लोक व्यवहार में प्रचलित हो गई। जो लोग 33 करोड़ या 36 करोड़ देवी-देवताओं के होने की बात करते हैं वे किस आधार पर करते हैं यह नहीं मालूम।
रुद्रदेव के पुत्र 49 मरुद्गण : मरुत अर्थात पहाड़। मरुद्गण का अर्थ मरुतों के गण। गण याने देवता। चारों वेदों में मिलाकर मरुद्देवता के मंत्र 498 हैं। यह भी उलेखित मरुतों का गण सात-सात का होता है। इस कारण उनको 'सप्ती' भी कहते हैं।
ब्रह्मा के पुत्र : विष्वकर्मा, अधर्म, अलक्ष्मी, आठवसु, चार कुमार, 14 मनु, 11 रुद्र, पुलस्य, पुलह, अत्रि, क्रतु, अरणि, अंगिरा, रुचि, भृगु, दक्ष, कर्दम, पंचशिखा, वोढु, नारद, मरिचि, अपान्तरतमा, वशिष्‍ट, प्रचेता, हंस, यति। कुल 59 पुत्र। इति।
चौदह भुवन : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, पाताल तथा रसातल, भूर्लोक, भूवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक।
चौदह रत्न : अमृत, ऐरावत, कल्पवृक्ष, कौस्तुभ मणि, उच्चैश्रवा घोड़ा, शंख, चंद्रमा, धनुष, कामधेनु, धनवंतरि वैध, रम्भा अप्सरा, लक्ष्मी, वासुकी, वृक्ष। 
चौदह मनु : ब्रह्मा के पुत्र स्वायंभुव, अत्रि के पुत्र स्वारोचिष, राजा प्रियव्रत के पुत्र तापस और उत्तम, रैवत, चाक्षुष, सूर्य के पुत्र श्राद्धेदंव (वैवस्वत), सावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि, चंद्रसावर्णि। मनुओं के नाम पर मनवंतर के नाम रखे गए हैं।
चौदह इंद्र : स्वर्ग पर राज करने वाले चौदह इंद्र माने गए हैं। इंद्र एक पद का नाम है किसी व्यक्ति या देवता का नहीं। इंद्र एक काल का नाम भी है- जैसे 14 मनवंतर में 14 इंद्र होते हैं। 14 इंद्र के नाम पर ही मनवंतरों के अंतर्गत होने वाले इंद्र के नाम भी रखे गए हैं।
सोलह श्रृंगार : उबटन लगाना, स्नान करना, स्वच्छ वस्त्र धारण करना, मांग भरना, महावर लगाना, बाल संवारना, तिलक लगाना, ठोढी़ पर तिल बनाना, आभूषण धारण करना, मेंहदी रचाना, दांतों में मिस्सी, आंखों में काजल लगाना, इत्र आदि लगाना, माला पहनना, नीला कमल धारण करना।
चंद्र की सोलह कला : अमृत, मनदा, पुष्प, पुष्टि, तुष्टि, ध्रुति, शाशनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्सना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्ण और पूर्णामृत।

जरा सोचिये - गिलहरी और अखरोट इधर मनुष्य और धन

एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी, गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी क्यों कि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी , कि थोडी आराम कर लूँ , वैसे ही उसे याद आता कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा गिलहरी फिर काम पर लग जाती.

गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी, तो उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं , पर उसे अखरोट याद आ जाता, और वो फिर काम पर लग जाती, ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था

ऐसे ही समय बीतता रहा ....एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया, गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के पूरी जिन्दगी काम करते - करते दाँत तो घिस गये, इन्हें खाऊँगी कैसे?


यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है क्युकी इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है

60 वर्ष की उम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है, या बैंक बैलेंस होता है, तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है

परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है, क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये : -
      *कितनी इच्छायें मरी होंगी
      *कितनी तकलीफें मिली होंगी
       *कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे

बहुत से बच्चो को ये कहते सुना होगा की मेरे बाप के पास तो पैसा है, कर लूंगा काम बाद में. फिर आगे आने वाले दिनों में उसकी स्थिती क्या होगी ये सबको पता होता है.  

इसलिए बच्चो को अच्छी से अच्छी शिक्षा देकर उन्हें काम करने लायक बनाये, उनके लिए धन इकठ्ठा करके नालायक नहीं. हाँ दुर्घटना या समारोह इत्यादि के लिए जरूर बचत करे, या दुर्घटना बीमा और मेडिकल बीमा जरूर करा कर रखे.
पर ऐसी बचत किस काम की जो आपको सुख नहीं दुःख दे. इसलिए इस बात को जरूर सोचिये. 

जानिये हिन्दू धर्म के अनुसार स्नान कब और कैसे करना चाहिए ??

जानिये हिन्दू धर्म के अनुसार स्नान कब और कैसे करना चाहिए ??

क्या आप जानते है की स्नान कब ओर केसे करना चाहिए ताकि घर की सुख और समृद्धि बढे, चलिए आज हम हिन्दू धर्म में बताई गयी महत्वपूर्ण बातों में से आज स्नान या नहाने के बारे में जानते है.

यहाँ हम जानने की कोशिश करेंगे स्नान करने का तरीका या स्नान के प्रकार :

अगर आप सुबह के समय नहाते है तो सुबह के स्नान को धर्म शास्त्र में चार उपनाम दिए है।

पहला - मुनि स्नान
जो सुबह 4 से 5 के बीच  किया जाता है। मुनि स्नान सर्वोत्तम है।
.
दूसरा - देव स्नान जो सुबह 5 से 6 के बिच किया जाता है। देव स्नान उत्तम है।
.
तीसरा - मानव स्नान जो सुबह 6 से 8 के बिच किया जाता है। मानव स्नान समान्य है।
.
चौथा - राक्षसी स्नान
जो सुबह 8 के बाद किया जाता है। राक्षसी स्नान धर्म में निषेध है।

स्नान करते समय करें इस मंत्र का जाप, जीवन के हर क्षेत्र में मिलेगी सफलता :

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरी जलऽस्मिन्सन्निधिं कुरु।।


नदी में स्नान करते समय करें ये काम मिलेगी सफलता :

यदि व्यक्ति नदी में स्नान कर रहा है तो उसे पानी पर ऊँ लिखकर उसमें तुरंत डुबकी लगा देनी चाहिए। ऐसा करने से उसे नदी स्नान का पूर्ण फल प्राप्त होगा। इसके अतिरिक्त आस-पास की नकारात्मक ऊर्जा भी नष्ट हो जाएगी। इस उपाय को करने से ग्रह दोष शांत होते हैं अौर बुरी नजर से भी बचाव होता है।
जानिये हिन्दू धर्म के अनुसार स्नान कब और कैसे करना चाहिए ??


अब ऊपर बताये अनुसार स्नान करने के फायदे एवं नुकसान :

मुनि स्नान
घर में सुख ,शांति ,समृद्धि, विध्या , बल , आरोग्य , चेतना , प्रदान करता है।

देव स्नान
आप के जीवन में यश , किर्ती , धन वैभव,सुख ,शान्ति, संतोष , प्रदान करता है।

मानव स्नान
काम में सफलता ,भाग्य ,अच्छे कर्मो की सूझ ,परिवार में एकता , मंगल मय , प्रदान करता है।
राक्षसी स्नान
दरिद्रता , हानि , कलेश ,धन हानि , परेशानी, प्रदान करता है ।

पुराने जमाने में इसी लिए सभी सूरज निकलने से पहले स्नान करते थे।  खास कर जो घर की स्त्री होती थी। चाहे वो स्त्री माँ के रूप में हो,पत्नी के रूप में हो,बेहन के रूप में हो। घर के बडे बुजुर्ग यही समझाते सूरज के निकलने से पहले ही स्नान हो जाना चाहिए। ऐसा करने से धन ,वैभव लक्ष्मी, आप के घर में सदैव वास करती है।

उस समय एक मात्र व्यक्ति की कमाई से पूरा हरा भरा पारिवार पल जाता था , और आज मात्र पारिवार में चार सदस्य भी कमाते है तब भी घर में पैसा नहीं रुकता उस की वजह हम खुद ही है । पुराने नियमो को तोड़ कर अपनी सुख सुविधा के लिए नए नियम बनाए है। ये प्रकृति के नियम है जिन्हें ऋषियों और मुनियों ने सबको बताया है, जो भी उस के नियमो का पालन नही करता ,उस का दुष्टपरिणाम सब को मिलता है। इसलिए अपने जीवन में कुछ नियमो को अपनाये । ओर उन का पालन भी करे।



Tags: स्नान मंत्र, स्नान करने का तरीका, स्नान करने का समय, स्नान करने का मंत्र, स्नान के प्रकार, स्नान कब करना चाहिए, स्नान करने का सही समय, नहाने का सही तरीका, नहाने का मंत्र, नहाने के नियम, 
Sponsored Links
Advertisements
 
Back To Top
Copyright © 2014 NaitikShiksha - Secret Moral Stories From Indian Mythology. Designed by OddThemes